टाइगर देकर दूसरे राज्यों से लाए जा रहे जंगली भैंसे और गेंडे, मुख्यमंत्री ने गिनाई वन विभाग की उपलब्धियां
अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस पर सीएम मोहन यादव ने पेंच एडवांस वार्निंग सिस्टम का लोकार्पण किया। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश में बाघों की संख्या अब 1 हजार से ज्यादा है।
भोपाल: मध्य प्रदेश के सभी वन क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से पुख्ता करने के लिए अब आधुनिक तकनीक यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद ली जाएगी। अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस के अवसर पर आयोजित एक भव्य राज्य स्तरीय कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने 'पेंच एडवांस वार्निंग सिस्टम' का आधिकारिक तौर पर लोकार्पण किया। इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि मध्य प्रदेश में बाघों की संख्या लगातार तेजी से बढ़ रही है। एक ऐसा दौर भी था जब प्रदेश में बाघों की संख्या मात्र दहाई के अंक में यानी 10 के आसपास हुआ करती थी, लेकिन यदि आज प्रदेशभर में बाघों की सटीक गिनती कराई जाए, तो यह संख्या 1 हजार से भी ज्यादा निकलकर सामने आएगी।
🌅 गुरु का वास्तविक अर्थ: अंधेरे से प्रकाश की ओर ले जाना
कुशाभाऊ ठाकरे हॉल में आयोजित इस राज्य स्तरीय कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने प्रदेशवासियों को गुरु पूर्णिमा की आत्मीय शुभकामनाएं दीं। सीएम मोहन ने कहा कि, ''गुरु शब्द का वास्तविक अर्थ ही होता है—अंधेरे से प्रकाश की तरफ ले जाने वाला मार्गदर्शक, जो हमें हमारे जीवन के सही उद्देश्य से परिचित कराता है।''
पूरी दुनिया में यदि भारत की एक अनूठी और विशिष्ट पहचान कायम है, तो उसकी सबसे बड़ी वजह यहाँ की समृद्ध 'गुरु-शिष्य परंपरा और संस्कृति' है। हम इसी उदार भाव को अपने जीवन में लेकर आगे बढ़ते हैं। आज हम सिर्फ अकेले बाघों (टाइगर) की बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि इस पूरी धरती और पर्यावरण के संरक्षण की बात कर रहे हैं।
जब भी हम अपने किसी भी देवी-देवता की बात करते हैं, तो उनके साथ प्रकृति के गहरे संबंध को दर्शाने के लिए उनके वाहनों को हमेशा अलग-अलग पशु-पक्षियों के जगत से जोड़ा गया है। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि वे पिछले दिनों ओरछा गए थे, जहाँ माता लक्ष्मी का बेहद खूबसूरत और प्राचीन मंदिर बना हुआ है। जब उस मंदिर को दूर से देखा जाता है, तो उसकी पूरी आकृति एक 'उल्लू' के जैसी प्रतीत होती है। हैरान करने वाली बात यह है कि उस अद्भुत इमारत को आज से करीब 300 साल पहले ही वास्तु कला के तहत तैयार किया गया था।
🐊 घड़ियाल हम पालते हैं, लेकिन टूरिज्म का फायदा राजस्थान उठाता है
जब भी हम शक्ति, पराक्रम और वन्यजीवों की बात करते हैं, तो बाघ (टाइगर) की कल्पना स्वतः हमारे मन में आ जाती है। मुख्यमंत्री ने बड़े ही रोचक अंदाज में कहा कि सरकार भले ही कई विभागों के साथ मिलकर चलती है, लेकिन उन्हें सबसे ज्यादा आंतरिक आनंद 'वन विभाग' के साथ काम करने में आता है, क्योंकि प्रकृति और जंगल के बीच की चेतना का अहसास ही कुछ अलग होता है।
उन्होंने कहा कि देश की सबसे स्वच्छ और निर्मल नदी 'चंबल' है। चंबल नदी के अंदर हम लगातार घड़ियालों को बचाने और उनके संरक्षण का काम पूरी निष्ठा से कर रहे हैं। लेकिन यह एक अलग विडंबना है कि चंबल में घड़ियाल के बच्चे जब दो-ढाई साल के होकर थोड़े बड़े हो जाते हैं, तब उन्हें पानी में सुरक्षित छोड़ दिया जाता है। घड़ियाल हम अपने यहाँ पालते हैं और उन्हें नदी में छोड़ते हैं, लेकिन चंबल घड़ियाल सेंचुरी के नाम पर सारा टूरिज्म का फायदा राजस्थान राज्य वाले उठा ले जाते हैं।
🐅 टाइगर देकर दूसरे राज्यों से लाए जा रहे हैं दुर्लभ वन्यजीव
मुख्यमंत्री ने आगे बताया कि चंबल नदी में मगरमच्छों की संख्या भी काफी बढ़ गई है, जिससे कई बार घड़ियालों की सुरक्षा को लेकर भी खतरा पैदा हो जाता है, क्योंकि मगरमच्छ अधिक ताकतवर होते हैं। यही मुख्य वजह है कि अब कूनो-पालपुर राष्ट्रीय उद्यान की नदियों में भी घड़ियाल छोड़े गए हैं, ताकि हमारे राज्य के घड़ियाल हमारे पास ही सुरक्षित रहें और इससे स्थानीय स्तर पर एक बेहतरीन इको-सिस्टम भी विकसित हो सके।
उन्होंने कहा कि आजकल जब वे दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्रियों से चर्चा करते हैं, तो इस बात पर विचार होता है कि किस राज्य से कौन से वन्यजीवों का आदान-प्रदान किया जा सकता है। इसी कड़ी में, मध्य प्रदेश ने दूसरे राज्यों को टाइगर (बाघ) देकर बदले में वहां से 'जंगली भैंसे' (वाइल्ड बफेलो) लाए हैं।
यह बेहद दिलचस्प है कि जंगली भैंसे आज से लगभग 100 साल पहले मध्य प्रदेश के जंगलों से पूरी तरह विलुप्त हो चुके थे। जहाँ तक हाथियों की बात है, वे तो खुद-ब-खुद चलकर मध्य प्रदेश की सीमा में आ गए, लेकिन अब वन्यजीवों की श्रृंखला में 'गैंडे' भी लाए जा रहे हैं।
प्रदेश में करीब 53 साल पहले बाघों की कुल संख्या केवल दो अंकों में सिमटी हुई थी, जो बढ़कर साल 2016 में लगभग 250 तक पहुँची और आज यदि नए सिरे से गिनती कराई जाए तो यह संख्या 1 हजार के आंकड़े को पार कर जाएगी। यह हमारे लिए गर्व की बात है कि आज राजधानी भोपाल शहर के ठीक पास के जंगलों में भी स्वतंत्र रूप से बाघ रह रहे हैं, और मानव तथा वन्यजीवों के बीच 'सह-अस्तित्व' (Co-existence) का इससे बेहतर और जीवंत उदाहरण पूरी दुनिया में दूसरा और कोई नहीं हो सकता।
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