फर्जी नर्सिंग कॉलेजों के खेल में बर्बाद हुए छात्रों के साल, जबलपुर में सड़कों पर उतरे पीड़ित छात्र-छात्राएं
मध्य प्रदेश में फर्जी नर्सिंग कॉलेज घोटाले और प्रशासनिक लापरवाही के कारण 25,000 से अधिक छात्र पिछले 6 सालों से अपनी डिग्री और परीक्षाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
जबलपुर: हाल ही में देश में जेन जी के एक बड़े आंदोलन को देखा गया था, जिसकी वजह से केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपना इस्तीफा तक देना पड़ गया था। लेकिन शिक्षा व्यवस्था की गड़बड़ी और धांधली का यह कोई अकेला मामला नहीं है। ठीक इसी प्रकार का गंभीर अन्याय मध्य प्रदेश में हजारों नर्सिंग के छात्र-छात्राओं के साथ हुआ है। नर्सिंग की उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही छात्राओं ने पूरी प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। इन पीड़ित छात्राओं का कहना है कि वे पिछले 5 सालों से केवल अपनी परीक्षाएं संपन्न कराने के लिए कड़ा संघर्ष कर रही हैं। नर्सिंग कॉलेज खोलने वालों ने भारी गड़बड़ी की, उन्हें नियमों को ताक पर रखकर मान्यता देने वालों ने गड़बड़ी की, और सरकार में बैठे हुए मंत्रियों तक ने इन फर्जी कॉलेजों की पुरजोर सिफारिश की थी।
⚖️ मामला हाईकोर्ट तक पहुँचा, लेकिन फर्जीवाड़ा करने वालों पर नहीं हुई कोई ठोस कार्रवाई
यह पूरा बहुचर्चित मामला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट तक पहुँचा, लंबी जांच-पड़ताल भी हुई, लेकिन पूरी जांच प्रक्रिया समाप्त होने के बाद भी फर्जीवाड़ा करने वाले किसी भी मुख्य दोषी को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया गया। इसके विपरीत, आज भी हजारों बेकसूर छात्र-छात्राएं केवल अपना भविष्य और करियर बचाने के लिए दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं।
उदाहरण के तौर पर, सुनीता सोनी नाम की एक छात्रा ने साल 2020 में एक निजी नर्सिंग कॉलेज में बीएससी नर्सिंग (BSc Nursing) कोर्स में प्रवेश लिया था। उसे पूरा अंदाज था कि वह अपने 4 साल के इस प्रोफेशनल कोर्स को साल 2024 तक आसानी से पूरा कर लेगी। लेकिन अब साल 2026 का जुलाई महीना भी खत्म होने को आ रहा है, और सुनीता सोनी अभी तक अपने बीएससी नर्सिंग के सेकंड ईयर की परीक्षा भी पास नहीं कर पाई है।
🎓 डिग्री के इंतजार में भटक रहे लगभग 25,000 छात्र-छात्राएं
सुनीता जैसे ही लगभग 25,000 छात्र-छात्राएं पिछले 6 लंबे सालों से अपनी वैध डिग्री और परीक्षाओं का इंतजार करने के लिए विवश हैं। इन सभी प्रभावित छात्रों ने न्याय के लिए कई बार बड़े पैमाने पर आंदोलन किए हैं। इसी कड़ी में गुरुवार को भी इनमें से कई छात्र-छात्राएं जबलपुर की सड़कों पर उतरकर अपना विरोध दर्ज कराने पहुँचे।
इन सभी छात्रों ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट और राज्य सरकार से पुरजोर अपील की है कि उनकी रुकी हुई परीक्षाएं जल्द से जल्द ली जाएं और उनका अटका हुआ कोर्स समय पर खत्म करवाया जाए। छात्रों का दर्द है कि उनके जीवन के महत्वपूर्ण 6 साल केवल सरकार और संबंधित विभागों की भारी लापरवाही की भेंट चढ़कर बर्बाद हो गए हैं।
सुनीता सोनी का कहना है कि, ''बीएससी नर्सिंग कोर्स में पढ़ने वाले अधिकांश विद्यार्थी छात्राएं हैं, और आज वे जीवन के ऐसे नाजुक मोड़ पर खड़ी हैं जहाँ यदि उनकी परीक्षाएं नहीं कराई गईं, तो उनका पूरा भविष्य पूरी तरह से बर्बाद हो जाएगा।'' इन छात्राओं का सीधा आरोप है कि, ''जिन लोगों ने मिलकर ये फर्जी कॉलेज खोले थे, उनके खिलाफ सख्त आपराधिक कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही, जिन्होंने इन फर्जी संस्थानों को धड़ल्ले से मान्यता दी, उन जिम्मेदार अधिकारियों पर भी कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। लेकिन विडंबना यह है कि असली दोषियों को सुरक्षित बचा लिया गया और उनकी आपराधिक करनी की सजा आज बेकसूर छात्र-छात्राएं भुगत रहे हैं।''
🔍 आखिर क्या था पूरा नर्सिंग कॉलेज फर्जीवाड़ा और कैसे हुआ खुलासा?
इस पूरे घोटाले की शुरुआत 26 सितंबर 2021 को हुई, जब जबलपुर के लॉ स्टूडेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष विशाल बघेल ने मध्य प्रदेश सरकार को एक औपचारिक पत्र प्रेषित किया। उन्होंने मांग की कि मध्य प्रदेश में कागजों पर संचालित हो रहे फर्जी नर्सिंग कॉलेजों की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए तथा नर्सिंग काउंसिल की तत्कालीन रजिस्ट्रार चंद्रकला दिवगैया के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाए।
जब 18 जनवरी 2022 तक इस गंभीर शिकायत पर शासन स्तर से कोई भी कार्रवाई नहीं की गई, तो मध्य प्रदेश लॉ स्टूडेंट्स एसोसिएशन ने राज्य में खुले नर्सिंग कॉलेजों की मान्यता देने में हुई व्यापक अनियमितताओं और फर्जीवाड़े को उजागर करते हुए माननीय हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर कर दी।
🏛️ मध्य प्रदेश नर्सिंग काउंसिल को नोटिस और रिकॉर्ड पेश करने के आदेश
याचिका में मुख्य रूप से यह कहा गया कि आदिवासी क्षेत्रों में संचालित जिन 55 नर्सिंग कॉलेजों को नियमों को ताक पर रखकर मान्यता प्रदान की गई है, वे सभी मान्यता के लिए निर्धारित बुनियादी मानदंडों जैसे- पर्याप्त बिल्डिंग, लैब, लाइब्रेरी, और अस्पताल आदि जैसी अनिवार्य अर्हताओं को बिल्कुल भी पूरा नहीं करते हैं। इसके बावजूद उन्हें सांठगांठ करके मान्यता दे दी गई थी।
15 मार्च 2022 को हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) की अध्यक्षता वाली बेंच ने इस मामले का संज्ञान लेते हुए मध्य प्रदेश सरकार और मध्य प्रदेश नर्सिंग काउंसिल को औपचारिक नोटिस जारी कर जवाब तलब किया। इसके बाद, स्वास्थ्य शिक्षा से जुड़े इस मामले की अत्यधिक गंभीरता को देखते हुए 19 अप्रैल 2022 को हाईकोर्ट ने राज्य शासन को आदेश दिया कि वे मध्य प्रदेश में संचालित सभी नर्सिंग कॉलेजों की मान्यता से जुड़े मूल रिकॉर्ड अदालत में पेश करें।
📁 हाईकोर्ट में पेश किए गए मान्यता के दस्तावेज और मिली भारी अनियमितताएं
12 मई 2022 को हाईकोर्ट के सख्त आदेश के पालन में सरकार ने सभी नर्सिंग कॉलेजों की मान्यता के तमाम रिकॉर्ड अदालत के समक्ष पेश किए। उसी दिन हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता 'लॉ स्टूडेंट्स एसोसिएशन' को उन सभी रिकॉर्ड्स का बारीकी से निरीक्षण (Inspection) करने की अनुमति प्रदान कर दी।
इसके बाद, 17 जून 2022 को याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट परिसर के भीतर ही लगातार एक महीने तक उन तमाम सरकारी रिकॉर्ड्स का गहन अवलोकन किया और अपनी विस्तृत रिपोर्ट अदालत में दाखिल की। रिकॉर्ड के इस इंस्पेक्शन के दौरान जो खुलासे हुए, वे चौंकाने वाले थे।
याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि हाईकोर्ट में पेश की गई कॉलेजों की मान्यता की फाइलों में बहुत सारे जरूरी दस्तावेज गायब पाए गए। अपनी रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि लगभग 37,759 पृष्ठ ऐसे थे, जिनका फाइलों में संलग्न होने का आधिकारिक उल्लेख तो था, लेकिन असल में वे फाइल में संलग्न ही नहीं किए गए थे।
इसके अलावा, लगभग 90% फाइलों में कॉलेजों की बिल्डिंग के लिए सक्षम प्राधिकारी द्वारा स्वीकृत नक्शे या लेआउट (Layout) तक संलग्न नहीं थे। हैरानी की बात तो यह थी कि बड़ी संख्या में ऐसे फर्जी कॉलेज भी पाए गए, जिन्होंने एक ही प्रिंसिपल और टीचिंग फैकल्टी को अलग-अलग 10-10 अलग कॉलेजों में दर्शाकर धोखाधड़ी से मान्यता हासिल कर ली थी।
📊 ऑनलाइन फैकल्टी डेटा सौंपने के निर्देश और रजिस्ट्रार का निलंबन
अपनी यह रिपोर्ट अदालत में दाखिल करने के साथ ही याचिकाकर्ता ने यह मांग भी की कि मध्य प्रदेश के सभी कॉलेजों में मान्यता लेने के लिए दिखाई गई फैकल्टी का वास्तविक ऑनलाइन डेटा भी मंगाया जाए।
याचिकाकर्ता की इस मांग को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने सरकार को आदेश दिया कि वह सभी फैकल्टी का ऑनलाइन डेटा याचिकाकर्ता को सौंपे। तदनुसार, 21 जुलाई 2022 को हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में मध्य प्रदेश के सभी कॉलेजों की लगभग 20,000 टीचिंग फैकल्टी का पूरा ऑनलाइन डेटा याचिकाकर्ता विशाल बघेल को उपलब्ध करा दिया गया।
इसके बाद, 23 अगस्त 2022 को नर्सिंग काउंसिल की तत्कालीन रजिस्ट्रार सुनीता सिजू द्वारा कोर्ट में एक शपथ पत्र पेश किया गया, जिसमें बताया गया कि वर्ष 2021-22 के दौरान पूरी जांच-पड़ताल करने के पश्चात 485 पुराने और 49 नए कॉलेजों को मान्यता दी गई है।
लेकिन उसी दिन की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की तरफ से अदालत में नए दस्तावेज पेश करते हुए न केवल हाल ही में खोले गए 10 नए कॉलेजों के फोटो और दस्तावेज दिखाए गए, बल्कि यह भी उजागर किया गया कि किस प्रकार नियमों को ताक पर रखकर फिर से नए कॉलेज खोल दिए गए हैं और उन्हें धड़ल्ले से मान्यता बांटी जा रही है।
मामले की भीषण गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने तत्परता दिखाते हुए नर्सिंग काउंसिल की तत्कालीन रजिस्ट्रार सुनीता सिजू को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड (Suspend) कर दिया और उनकी जगह पर एक नए प्रशासक को नियुक्त करने के सख्त आदेश जारी किए।
CBI जांच के आदेश और जबलपुर प्रिंसिपल बेंच में मामलों का स्थानांतरण
28 सितंबर 2022 को ग्वालियर हाईकोर्ट बेंच के समक्ष 25 से अधिक ऐसे नर्सिंग कॉलेजों की याचिकाएँ सुनवाई के लिए आईं, जिनमें मेडिकल यूनिवर्सिटी को पक्षकार बनाकर पुराने नामांकन (Enrollment) नहीं जारी करने के निर्णय को चुनौती दी गई थी।
जब ग्वालियर बेंच ने उन सभी प्रकरणों में कॉलेजों के मान्यता और संबद्धता से जुड़े तमाम दस्तावेज अदालत में मंगवाकर खुद देखे, तो पाया कि उनमें बड़े पैमाने पर गंभीर गड़बड़ियां भरी पड़ी हैं। इन तमाम अनियमितताओं और फर्जीवाड़े को देखते हुए माननीय उच्च न्यायालय की ग्वालियर बेंच ने इस पूरे मामले में सीबीआई (CBI) जांच के आदेश पारित कर दिए।
इसके पश्चात, 17 फरवरी 2023 को सरकार द्वारा समय-समय पर अदालत में पेश की गई रिपोर्टों और याचिकाकर्ता के मजबूत तर्कों को सुनने के बाद, हाईकोर्ट ने शैक्षणिक सत्र 2022-23 के दौरान मान्यता प्रदान किए गए सभी 491 नर्सिंग कॉलेजों की इंस्पेक्शन रिपोर्ट भी याचिकाकर्ता विशाल बघेल को सौंपने के आदेश दे दिए।
आगे चलकर 31 जुलाई 2023 को जब हाईकोर्ट के संज्ञान में यह बात आई कि ग्वालियर बेंच में नर्सिंग घोटाले से जुड़ी एक अन्य जनहित याचिका भी लंबित है, तो माननीय उच्च न्यायालय द्वारा यह निर्देश दिए गए कि ग्वालियर बेंच के अंतर्गत आने वाले सभी मामले तुरंत जबलपुर प्रिंसिपल बेंच में ट्रांसफर किए जाएं, और उन सभी की संयुक्त सुनवाई अब जबलपुर में लॉ स्टूडेंट्स एसोसिएशन की मुख्य जनहित याचिका के साथ ही की जाएगी।
🛑 हाईकोर्ट द्वारा सरकार के नए नियमों पर रोक और छात्रों का अनिश्चित भविष्य
8 फरवरी 2024 को सीबीआई ने अपनी जांच रिपोर्ट पेश करते हुए कुल 308 नर्सिंग कॉलेजों की जांच का ब्योरा सामने रखा। इनमें से सीबीआई ने 169 कॉलेजों को 'सूटेबल' (Suitable), 65 को 'अनसूटेबल' (Unsuitable), और 74 कॉलेजों को 'डेफिशिएंट' (Deficient) श्रेणी में पाया।
इसके तुरंत बाद, 13 फरवरी 2024 को बाकी बचे हुए लगभग 370 शेष नर्सिंग कॉलेजों की भी निष्पक्ष जांच करने के कड़े आदेश दे दिए गए।
लेकिन इसके बाद मार्च 2024 में याचिकाकर्ता लॉ स्टूडेंट्स एसोसिएशन ने हाईकोर्ट में एक नया आवेदन पेश किया। अदालत को अवगत कराया गया कि जब सरकार के कई कॉलेज 'अनसूटेबल' पाए गए और सैकड़ों संस्थानों में भारी खामियां उजागर हुईं, तो शासन ने इसका एक 'बैकडोर रास्ता' निकाल लिया।
सरकार ने भारतीय नर्सिंग परिषद (INC) के निर्धारित मानकों के बिल्कुल विपरीत जाकर, जहाँ पहले नियमानुसार कम से कम 23,000 वर्ग फीट के विशाल भवन की आवश्यकता होती थी, वहीं अब नियमों में संशोधन करते हुए मात्र 8,000 से 9,000 वर्ग फीट के छोटे भवन में भी कॉलेज संचालन की मान्यता देने के नए प्रावधान तैयार कर दिए।
याचिकाकर्ता के इन तर्कों को गंभीरता से सुनने के बाद, हाईकोर्ट ने सरकार द्वारा मनमाने ढंग से बनाए गए इन नए और संदेहास्पद नियमों पर आगामी आदेश तक के लिए पूरी तरह रोक लगा दी।
📋 परीक्षाओं का पटरी पर लौटना, लेकिन आज भी न्याय के इंतजार में भटक रहे हजारों छात्र
वर्ष 2025 में हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए उन तमाम संस्थानों के छात्र-छात्राओं को अन्य सुरक्षित स्थानों पर ट्रांसफर करने के आदेश जारी किए, जो जांच में 'अनसूटेबल' पाए गए थे।
इसके बाद मार्च 2026 में हाईकोर्ट ने सीबीआई की अंतिम जांच रिपोर्ट के आधार पर 'सूटेबल' घोषित की जा चुकी संस्थाओं के परीक्षा परिणाम घोषित करने और नई परीक्षाएं आयोजित करने की अनुमति आखिरकार मध्य प्रदेश नर्सिंग काउंसिल को दे दी।
तथापि, इसके बावजूद आज भी हजारों ऐसे छात्र हैं जो पहले उन अनसूटेबल कॉलेजों में पढ़ाई कर रहे थे, जिन्हें परीक्षा में बैठने का प्रत्यक्ष अवसर अभी तक नहीं मिल पाया है। इसके अलावा, जो एजेंसियां और संस्थान पूरी तरह से इस बड़े फर्जीड़े में संलिप्त थे, उनके छात्र-छात्राओं से जुड़े तमाम मामले आज भी कानूनी उलझनों के बीच अधर में लटके हुए हैं।
यह एक कड़वी सच्चाई है कि हालांकि पिछले दो सालों से बीएससी नर्सिंग की पढ़ाई और परीक्षाएं किसी हद तक दोबारा पटरी पर लौट जरूर आई हैं, परंतु वर्ष 2019 से लेकर वर्ष 2024 के बीच के सत्रों में फंसे हजारों छात्र आज भी मानसिक प्रताड़ना और अनिश्चितता का शिकार बने हुए हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि फर्जी नर्सिंग कॉलेज स्थापित करने वाले शातिर लोग, उन्हें नियमों को ताक पर रखकर संरक्षण देने वाले भ्रष्ट अधिकारी, और शासन की कुर्सियों पर बैठे हुए वे तमाम मंत्री—इस पूरी लंबी जांच के दौरान आखिरकार कहीं भी कानूनी शिकंजे में क्यों नहीं फंसे?
इन सभी ने पीड़ित और मासूम छात्र-छात्राओं से मोटी फीस वसूलकर अपनी-अपनी जेबें तो भर लीं, लेकिन यह किस प्रकार की अजीब जांच थी जिसने छात्र-छात्राओं का पूरा भविष्य और उनके सुनहरे साल हमेशा के लिए तबाह कर दिए, जबकि असली दोषी आज भी कानून की गिरफ्त से पूरी तरह बाहर घूम रहे हैं?
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