कृषि विश्वविद्यालय की अनूठी पहल, बायोगैस से पकेगा भोजन, जानिए क्या है पूरी योजना
राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय ग्वालियर और इंदौर में बायोगैस प्लांट लगाने जा रहा है। यहाँ गोबर, नरवाई और किचन वेस्ट से रसोई गैस तैयार की जाएगी।
ग्वालियर: राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय जल्द ही रिन्यूएबल एनर्जी (अक्षय ऊर्जा) के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक कदम बढ़ाने जा रहा है। विश्वविद्यालय द्वारा तैयार की जाने वाली यह रिन्यूएबल एनर्जी बायोगैस के रूप में उपभोक्ताओं को मिलेगी, जिसका मुख्य उपयोग घरेलू रसोई गैस के रूप में किया जाएगा। यह पूरी तरह से बायो-रिसोर्सेज का बेहतरीन इस्तेमाल करके तैयार की जाएगी। इस महत्वाकांक्षी बायोगैस प्रोजेक्ट के तहत विश्वविद्यालय द्वारा इंदौर और ग्वालियर में विशेष प्लांट्स भी स्थापित किए जाएंगे। यह प्रयोग मध्य प्रदेश में संभवतः अपनी तरह का पहला ऐसा अनूठा प्रयास होगा, जहाँ बायोगैस निर्माण के लिए पारंपरिक गोबर गैस के अलावा एक बिल्कुल नए और आधुनिक मिश्रण का उपयोग किया जाएगा। इसे खेतों में फसल कटाई के बाद बचने वाले ठूठ या नरवाई, घरों व संस्थानों से निकलने वाले किचन वेस्ट और गोबर को मिलाकर तैयार किया जाएगा, जिस पर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक गहन शोध भी करेंगे।
🤝 एक निजी कंपनी के साथ हुआ एमओयू, निवेश और प्रॉफिट शेयरिंग का प्रावधान
राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय ने इस महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट पर अभी से जमीनी स्तर पर काम शुरू कर दिया है। इसके लिए विश्वविद्यालय प्रबंधन ने 'सावित्री रिन्यूएबल एनर्जी' नामक कंपनी के साथ एक आधिकारिक एमओयू (MoU) साइन किया है।
यह कंपनी इस प्रोजेक्ट में न केवल अपनी तकनीकी विशेषज्ञता और नॉलेज शेयरिंग करेगी, बल्कि इस पूरे प्रोजेक्ट में आर्थिक निवेश (पैसा) भी लगाएगी। इसी अनुबंध के आधार पर कंपनी के साथ प्रॉफिट शेयरिंग (मुनाफा साझा करने) का स्पष्ट प्रावधान भी रखा गया है।
🧪 गोबर, किचन वेस्ट और फसल अवशेषों के अनूठे मिश्रण पर होगी रिसर्च
ग्वालियर एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के कुलगुरु प्रो. अरविंद कुमार शुक्ला ने जानकारी देते हुए बताया कि, ''विश्वविद्यालय बायो-रिसोर्स के तहत इस आधुनिक बायोगैस प्रोजेक्ट पर काम करने जा रहा है।''
उन्होंने बताया कि पारंपरिक रूप से पहले केवल गोबर के जरिए गोबर गैस बनाई जाती थी, जिसके लिए सिर्फ गोबर का ही प्रयोग होता था। लेकिन विश्वविद्यालय के इस नए बायोगैस प्रोजेक्ट में क्रॉप रेसिड्यू (फसल कटने के बाद खेतों में बचने वाले अवशेष जैसे ठूठ या नरवाई), इसके साथ किचन से निकलने वाला गीला कचरा (जैसे चायपत्ती, फल-सब्जियों के अवशेष व छिलके) और गोबर—इन तीनों को एक साथ मिलाकर एक नया और वैज्ञानिक शोध किया जाएगा कि इन तीनों के कॉम्बिनेशन से किस प्रकार की उच्च गुणवत्ता वाली बायोगैस बन सकती है, उसका कुल कितना उत्पादन होगा और उसे सुरक्षित तरीके से घरों तक कैसे पहुँचाया जा सकता है।
🏗️ इंदौर में काम शुरू, ग्वालियर में भी जल्द बनेगा बायोगैस टैंक
कुलगुरु शुक्ला ने आगे बताया कि इस प्रोजेक्ट और शोध कार्य पर तेजी से काम शुरू कर दिया गया है। इसके तहत राज्य की आर्थिक राजधानी इंदौर में पहला संयंत्र (प्लांट) स्थापित किया जा रहा है।
वहाँ बायो गैस का मुख्य टैंक बनकर पूरी तरह तैयार हो चुका है, और इसके अलावा डीकंपोजीशन का बाहरी टैंक भी तैयार किया जा रहा है, जो जल्द ही पूरी तरह से बनकर तैयार हो जाएगा। इसके बाद घरों तक गैस की सप्लाई के लिए पाइपलाइन बिछाने का कार्य किया जाना बाकी है। इसी कड़ी में अब ग्वालियर में भी जल्द ही इस पर काम धरातल पर उतरने वाला है। यहाँ के लिए परियोजना की रूपरेखा तैयार की जा चुकी है, और जल्द ही टेंडर प्रक्रिया पूरी कर निर्माण कार्य शुरू कर दिया जाएगा।
🏡 मॉडल के रूप में होगा तैयार, विश्वविद्यालय परिसर के घरों में पकेगा भोजन
कृषि विश्वविद्यालय शुरुआती चरण में इस नए तरह की बायोगैस के लिए अपने ही परिसर के भीतर बचने वाले बायो-रिसोर्स का उपयोग करेगा।
यूनिवर्सिटी परिसर में बने आवासों और कैंटिन से निकलने वाला किचन वेस्ट, यूनिवर्सिटी के खेतों से मिलने वाला क्रॉप रेसिड्यू और परिसर में मौजूद पशुओं का गोबर इकट्ठा कर गैस निर्माण का काम किया जाएगा। एक बार जब यह बायो गैस पूरी तरह से तैयार हो जाएगी, तो विश्वविद्यालय परिसर की कैंटीन और आवासों की रसोई में इसकी सप्लाई सीधी पाइपलाइन के माध्यम से की जाएगी। कुलगुरु का कहना है कि यूनिवर्सिटी इसे एक रिसर्च और एक बेहतरीन मॉडल के रूप में विकसित कर रही है।
🔮 भविष्य की क्या है बड़ी प्लानिंग और दूरगामी सोच?
राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय इस प्रोजेक्ट पर एक बहुत ही दूरगामी सोच के साथ आगे बढ़ रहा है। शुरुआत में यूनिवर्सिटी ऐसे अलग-अलग बायोगैस मॉडल तैयार करेगी जिनकी क्षमता लगभग 50 घन मीटर होगी।
यदि ये मॉडल पूरी तरह से सफल साबित होते हैं, तो भविष्य में इन्हें निजी कंपनियों को हस्तांतरित (बेचा) किया जाएगा, जो इनका बड़े पैमाने पर व्यवसायीकरण कर सकेंगी। इस कार्य के लिए सरकार की ओर से भी इन कंपनियों को आवश्यक सहायता प्रदान की जाएगी।
⏱️ प्रोजेक्ट को पूरा होने में कितना समय लगेगा?
कृषि विश्वविद्यालय प्रबंधन के मुताबिक, इस पूरे प्रोजेक्ट को जमीन पर पूरी तरह उतरने और चालू होने में लगभग 6 से 8 महीने का समय लग सकता है।
इंदौर में बन रहा बायोगैस प्लांट लगभग 6 महीने के भीतर पूरी तरह से बनकर तैयार होने के बाद चालू हालत में आ जाएगा, जबकि ग्वालियर में प्लांट को पूरी तरह तैयार होने में कम से कम 8 महीने का समय लग सकता है। इसके लिए दोनों ही स्थानों पर पूरी गति के साथ काम किया जा रहा है।
🌟 मध्य प्रदेश का पहला सबसे अनोखा बायोगैस प्लांट!
कुलगुरु प्रो. अरविंद कुमार शुक्ला ने अंत में कहा कि, यह प्लांट अब तक मध्य प्रदेश में लगाए गए किसी भी अन्य बायोगैस प्लांट से बेहद अलग और अनूठा होगा, क्योंकि इसमें किचन वेस्ट, फसल अवशेष, गोबर और गौमूत्र का एक साथ और वैज्ञानिक तरीके से उपयोग होने वाला है। इस पर उच्च स्तर का शोध कार्य भी किया जाएगा, जिससे यह साबित होगा कि नए कॉम्बिनेशन के जरिए कितनी प्रभावी नेचुरल गैस (बायोगैस) तैयार की जा सकती है।
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