धार की संगीता भाभर ने पेश की मिसाल; बायो-इनपुट सेंटर और 'देशी सीड बैंक' से संवारी 200+ किसानों की खेती
धार जिले की संगीता भाभर ने बायो-इनपुट रिसोर्स सेंटर और 'देशी सीड बैंक' के जरिए प्राकृतिक खेती की अलख जगाई है। 234 से अधिक किसान जैविक खेती से जुड़ चुके हैं।
धार। मध्य प्रदेश के धार जिले के डही विकासखंड अंतर्गत देवधा गांव की निवासी संगीता भाभर आज अंचल की सैकड़ों महिला किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुकी हैं। जहां एक ओर बढ़ती लागत और जलवायु परिवर्तन के कारण खेती एक जोखिम भरा सौदा बनती जा रही है, वहीं संगीता दीदी ने पारंपरिक ज्ञान और प्राकृतिक संसाधनों के बल पर आत्मनिर्भरता का नया मार्ग खोज निकाला है। संगीता भाभर की इस सफलता की गूंज हाल ही में धार जिला पंचायत सभागार में आयोजित 'उद्यमी संवाद' कार्यक्रम में भी सुनाई दी। जन विश्वास यात्रा के दौरान प्रदेश शासन के मुख्य सचिव अशोक वर्णवाल की उपस्थिति में संगीता दीदी ने अपने संघर्ष और सफलता की पूरी कहानी साझा की।
🧪 जैविक इनपुट से घटाई खेती की लागत: 234 से अधिक किसानों को रासायनिक खादों से दिलाई मुक्ति
संगीता भाभर 'समर्थन' संस्था और कृषि विभाग के सहयोग से अपने गांव में एक बायो-इनपुट रिसोर्स सेंटर (Bio-Input Resource Center) का सफल संचालन कर रही हैं।
इस सेंटर के माध्यम से वे क्षेत्र के किसानों को जीवामृत, जैविक पेस्टिसाइड (कीटनाशक) और जैविक टॉनिक तैयार करके उपलब्ध कराती हैं। रासायनिक खाद और महंगे बाजारू कीटनाशकों पर निर्भरता कम करके वे अब तक 234 से अधिक किसानों को प्राकृतिक व जैविक खेती की ओर मोड़ चुकी हैं। इस पहल से न केवल खेतों की मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार हो रहा है, बल्कि संगीता दीदी को खुद भी हर सीजन में 35 से 40 हजार रुपये की अतिरिक्त आमदनी हो जाती है।
🌰 '1 के बदले 1.5 किलो' का अनूठा देशी सीड बैंक: 6 क्विंटल पारंपरिक बीजों का किया संरक्षण
संगीता दीदी का सबसे बड़ा और सराहनीय प्रयास विलुप्त हो रहे पारंपरिक बीजों को सहेजना और उनका संवर्धन करना है।
उन्होंने अपने गांव में एक 'देशी सीड बैंक' की स्थापना की है, जिसमें देशी ज्वार, बाजरा, मूंगफली, मूंग, मक्का, कुल्थी, तुअर और चौलाई जैसी फसलों के लगभग 6 क्विंटल पारंपरिक बीज सुरक्षित रखे गए हैं। बीज संवर्धन को बढ़ावा देने के लिए वे एक अनोखा मॉडल अपनाती हैं—स्थानीय किसानों को वे 1 किलो देशी बीज बोने के लिए देती हैं और फसल पकने के बाद उनसे 1.5 किलो बीज वापस लेती हैं। इस चक्रीय व्यवस्था से बीजों की उपलब्धता लगातार बढ़ रही है और आज आसपास के 5 से 6 गांवों के किसान अपने खेतों में इन्हीं देशी बीजों को बो रहे हैं।
🛡️ जलवायु जोखिम के दौर में आत्मनिर्भरता की नई अलख: टिकाऊ और फायदेमंद खेती का मॉडल
संगीता भाभर का मानना है कि महंगे रासायनिक खादों और बीजों के कारण किसानों की कमाई का बड़ा हिस्सा केवल लागत में चला जाता है, जिससे वे धीरे-धीरे कर्ज के जाल में फंस जाते हैं।
ऐसे में प्राकृतिक खेती और देशी बीज किसानों को न केवल कम लागत में बेहतर उत्पादन देते हैं, बल्कि जलवायु परिवर्तन के दौर में भी फसलों को अधिक सहनशील बनाते हैं। संगीता दीदी की यह पहल यह साबित करती है कि यदि महिला उद्यमिता, स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान को सही दिशा दी जाए, तो खेती को टिकाऊ व फायदेमंद बनाने के साथ-साथ समाज में आत्मनिर्भरता की एक नई क्रांति लाई जा सकती है।
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