स्टाइपेंड बढ़ाने की मांग को लेकर छिंदवाड़ा में जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल, स्वास्थ्य व्यवस्था प्रभावित
छिंदवाड़ा में जूनियर डॉक्टरों ने स्टाइपेंड बढ़ाने की मांग को लेकर हड़ताल शुरू कर दी है। छात्रों का कहना है कि उन्हें मजदूरी से भी कम स्टाइपेंड मिल रहा है।
छिंदवाड़ा: इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज से पास आउट होकर इंटर्नशिप कर रहे जूनियर डॉक्टरों ने अपना स्टाइपेंड बढ़ाने की जोरदार मांग को लेकर अब छिंदवाड़ा जिले में हड़ताल का बिगुल फूंक दिया है। इस अचानक शुरू हुई हड़ताल की वजह से जिले की स्वास्थ्य व्यवस्थाएं बुरी तरह से लड़खड़ाने लगी हैं। जूनियर डॉक्टरों का साफ तौर पर कहना है कि, शिक्षण संस्थान द्वारा फीस तो हमसे बहुत अधिक वसूली जा रही है, लेकिन इसके बदले में स्टाइपेंड हमें दैनिक मजदूरी से भी बेहद कम दिया जा रहा है। यदि जल्द ही स्टाइपेंड नहीं बढ़ाया गया, तो वे संपूर्ण हड़ताल करने के लिए मजबूर हो जाएंगे।
🩺 मजदूरी से भी कम मिल रहा स्टाइपेंड, काम बंद करने की चेतावनी
इंटर्नशिप कर रहे जूनियर डॉक्टर प्रियेश सहारे ने अपनी पीड़ा साझा करते हुए बताया, "मध्य प्रदेश फीस वसूलने के मामले में देश में तीसरे स्थान पर है, लेकिन जब स्टाइपेंड देने की बारी आती है तो यह राज्य नीचे से तीसरे नंबर पर आता है। वर्तमान में हमें हर महीने मात्र 14,337 रुपये का स्टाइपेंड दिया जा रहा है, जबकि हमारी मुख्य मांग है कि इसे बढ़ाकर कम से कम 30,000 रुपये प्रतिमाह किया जाए।"
उन्होंने आगे कहा कि यदि हम अपने घरों में किसी मजदूर को काम पर भी बुलाते हैं, तो उसे रोजाना कम से कम 500 रुपये दिए जाते हैं, जबकि हम अस्पतालों में लगातार 12 घंटे कठिन काम कर रहे हैं और हमें प्रतिदिन केवल 477 रुपये ही स्टाइपेंड के रूप में दिए जा रहे हैं। फिलहाल हम सांकेतिक रूप से हड़ताल कर रहे हैं, लेकिन अगर सरकार ने हमारी जायज मांग नहीं मानी, तो हमें मजबूरन पूरी तरह काम बंद कर अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाना पड़ेगा।
🗣️ मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से मिलकर अपनी परेशानियां बताएंगे डॉक्टर
आगामी 7 अगस्त को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का छिंदवाड़ा दौरा प्रस्तावित है, जहाँ वे एक स्थानीय समाधान कार्यक्रम में शामिल होने आ रहे हैं।
जूनियर डॉक्टरों ने बताया कि इस संबंध में हमारी बातचीत प्रदेश स्तर पर लगातार चल रही है। यदि आवश्यकता पड़ी, तो हम सभी डॉक्टर एकजुट होकर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात करेंगे और अपनी तमाम परेशानियों और आर्थिक समस्याओं से उन्हें अवगत कराएंगे।
🏍️ कलेक्ट्रेट तक निकाली बाइक रैली, तहसीलदार को सौंपा ज्ञापन
शनिवार को अपनी इन्हीं मांगों के समर्थन में छिंदवाड़ा के जूनियर डॉक्टरों ने एक आक्रोशित बाइक रैली निकाली और शहर के मुख्य मार्गों से होते हुए कलेक्ट्रेट कार्यालय तक कूच किया।
इसके बाद जिला कलेक्ट्रेट परिसर में पहुंचकर उन्होंने मुख्यमंत्री मोहन यादव के नाम एक ज्ञापन स्थानीय तहसीलदार को सौंपा और अपनी मांगें पुरजोर तरीके से रखीं।
📚 एमबीबीएस के बाद इंटर्नशिप क्यों होती है बेहद जरूरी?
एमबीबीएस की डिग्री पूरी होने के बाद की जाने वाली इंटर्नशिप एक अनिवार्य प्रैक्टिकल ट्रेनिंग (प्रैक्टिकल नॉलेज) होती है, जिसे पूरे 1 साल तक पूरा करना होता है। इसे 'कंपलसरी रोटेटिंग मेडिकल इंटर्नशिप' (Compulsory Rotating Medical Internship) कहा जाता है। इसे नेशनल मेडिकल काउंसिल (NMC) से मान्यता प्राप्त अस्पतालों में ही पूरा करना कानूनी रूप से अनिवार्य होता है।
इस दौरान मेडिकल छात्रों को अस्पताल के अलग-अलग विभागों—जैसे मेडिसिन, सर्जरी, पीडियाट्रिक्स (शिशु रोग) और इमरजेंसी वार्ड—में बारी-बारी से काम करना और मरीजों को संभालना सिखाया जाता है। किताबों में पढ़े गए थ्योरी ज्ञान को असल मरीजों के इलाज में कैसे इस्तेमाल करना है और मेडिकल की बारीकियों को जमीन पर कैसे सीखना है, इसके लिए यह इंटर्नशिप बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। सरकारी मेडिकल कॉलेजों में इस इंटर्नशिप की अवधि के दौरान छात्रों को हर महीने सरकार की तरफ से स्टाइपेंड दिया जाता है, जिसकी राशि अलग-अलग राज्यों और कॉलेजों के नियमों के आधार पर तय होती है।
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