श्योपुर से बार-भाग रहे चीते, एक्सपर्ट ने बताई भोजन और स्पेस की कमी बड़ी वजह
कूनो नेशनल पार्क से चीतों के बार-बार भागने और रिहायशी इलाकों में पहुँचने की घटनाओं पर विशेषज्ञों ने चिंता जताई है। जानिए क्या हैं इसके मुख्य कारण।
श्योपुर: चीता संरक्षण और पुनर्वास का प्रमुख केंद्र माने जाने वाले मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क से लगातार चीतों के पार्क की सीमा लांघकर बाहर भागने की घटनाएं सामने आ रही हैं। इन घटनाओं ने देश-विदेश के वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट्स को गहरी चिंता में डाल दिया है। ताजा मामला श्योपुर जिले के सोई कलां क्षेत्र का है, जहाँ कूनो नेशनल पार्क से निकला एक चीता करीब 4-5 दिनों तक लगातार रिहायशी इलाके के भीतर घूमता रहा और स्थिति तब और खतरनाक हो गई जब कुछ ग्रामीणों ने उस पर पत्थरों से हमला कर दिया। इन बार-बार होने वाली घटनाओं ने कूनो नेशनल पार्क के प्रबंधन पर एक बार फिर बड़े सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं, कि आखिर ऐसी क्या वजह है कि कूनो से चीते बार-बार भागकर दूसरे ग्रामीण क्षेत्रों और यहाँ तक कि पड़ोसी राज्यों तक पहुँच जा रहे हैं? आइए जानते हैं इस पर जाने-माने वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट्स की क्या राय है।
🦌 कूनो में पर्याप्त भोजन की कमी और घास के मैदानों का विकास न होना
कूनो नेशनल पार्क से चीतों के लगातार भागने और उन पर मंडरा रहे खतरों को लेकर ईटीवी भारत ने वरिष्ठ वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट अजय दुबे से खास बातचीत की। इस चर्चा के दौरान अजय दुबे ने बताया कि, "चीतों के बार-बार बाहर भागने के पीछे मुख्य रूप से कई वजहें जिम्मेदार हैं। सबसे पहले तो श्योपुर क्षेत्र में दो अलग-अलग वन क्षेत्र आते हैं—एक श्योपुर डिवीजन का जंगल है और दूसरा कूनो नेशनल पार्क है। चीतों को मुख्य रूप से कूनो नेशनल पार्क क्षेत्र में छोड़ा गया था, जो अक्सर वहाँ से निकलकर श्योपुर के ग्रामीण जंगलों में पहुँच जाते हैं और कई बार उत्तर प्रदेश के इटावा, राजस्थान या अन्य सीमावर्ती इलाकों तक चले जाते हैं। इनके बाहर आने की सबसे प्रमुख वजह भोजन की तलाश है।"
वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट का कहना है कि चीते मुख्य रूप से बकरियों या बछड़ों का शिकार करने के लिए मजबूर हो रहे हैं, क्योंकि उन्हें कूनो के भीतर प्राकृतिक रूप से हिरण पर्याप्त मात्रा में भोजन के तौर पर नहीं मिल पा रहे हैं। कूनो में जो हिरण या ब्लैकबक छोड़े गए थे, वे यहाँ ठीक से पनप नहीं सके। वर्ष 2022 से लेकर अब तक कूनो में एक हजार से ज्यादा हिरण छोड़े गए, लेकिन उनकी संख्या में अपेक्षित वृद्धि दिखाई नहीं दी। कायदे से अब तक उनकी संख्या बढ़कर दो से ढाई हजार हो जानी चाहिए थी, लेकिन इसके पीछे सबसे बड़ी वजह जंगलों में उपयुक्त घास के मैदानों (Grasslands) का सही ढंग से विकसित न होना है। अगर घास के मैदान ही विकसित नहीं होंगे, तो हिरण कैसे पनपेंगे? और यदि हिरण नहीं होंगे, तो चीते भोजन की तलाश में बाहर भागेंगे ही।
🗺️ चीतों के लिए छोटा पड़ रहा है कूनो का वर्तमान क्षेत्रफल
वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट्स के अनुसार, चीतों के लगातार कूनो नेशनल पार्क की सीमा से बाहर भागने का दूसरा सबसे बड़ा कारण यह है कि यह क्षेत्र उनकी प्राकृतिक दौड़ और स्वभाव के हिसाब से छोटा पड़ रहा है। इस अहम तथ्य को बिल्कुल नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि चीता बहुत तेज रफ्तार से दौड़ने वाला और लंबी दूरी तय करने वाला वन्यजीव है। ऐसे में जिस सीमित क्षेत्र में उन्हें रखा गया है, वह उनके लिए नाकाफी साबित हो रहा है। इस पर वन विभाग और सरकार को गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
⚠️ अंदर लेपर्ड का दबाव और बाहर ग्रामीणों का खतरा
सोई कलां क्षेत्र के रिहायशी इलाके में चीता घुसने की हालिया घटना पर बात करते हुए एक्सपर्ट ने कहा कि ग्रामीणों द्वारा चीते पर पत्थर से हमला करना या उसे खदेड़ना किसी भी लिहाज से सही नहीं है। यह बेहद चिंताजनक स्थिति है क्योंकि आज के समय में चीते न तो जंगल के अंदर सुरक्षित हैं और न ही बाहर। जंगल के भीतर उन्हें तेंदुओं (Leopards) से जान का खतरा रहता है, और कई बार लेपर्ड्स के भारी क्षेत्रीय दबाव के कारण भी वे मजबूरन पार्क से बाहर की ओर भागते हैं।
🔍 कूनो के वन प्रबंधन और शिकार की घटनाओं पर उठे गंभीर सवाल
वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट ने कूनो के जंगल के भीतर चल रही व्यवस्थाओं पर बड़ा सवाल उठाते हुए याद दिलाया कि हाल ही में 23 जुलाई को आगरा में कई शिकारी पकड़े गए थे, जिन्होंने पूछताछ में खुलासा किया था कि उन्होंने कूनो नेशनल पार्क के अंदर कई तेंदुओं का शिकार किया है। कूनो के जंगलों के भीतर आखिर चल क्या रहा है, यह बात अब समझ से परे होती जा रही है।
यदि वन विभाग के नाक के नीचे इस तरह तेंदुओं का शिकार हो रहा है, तो फिर खुले में रहने वाले चीते किस हद तक सुरक्षित होंगे, इसकी केवल कल्पना ही की जा सकती है। इससे यह पूरी तरह साफ हो गया है कि कूनो नेशनल पार्क में चीतों को भोजन और पानी दोनों की गंभीर समस्या आ रही है, और इसी तलाश में वे यहाँ-वहाँ भटक रहे हैं। यह इस बात का भी साफ इशारा है कि कूनो में 'सबकुछ ठीक है' के दावे केवल कागजों तक ही सीमित हैं।
🚶♂️ शुक्रवार की घटना पर वन विभाग की चुप्पी और सुरक्षा के दावे
इसी बीच, शुक्रवार शाम सोशल मीडिया पर श्योपुर के सोई कलां क्षेत्र का एक वीडियो तेजी से वायरल हुआ, जिसमें कुछ स्थानीय ग्रामीण चीते को मारने के लिए हाथ में पत्थर लेकर उसके पीछे दौड़ते नजर आए। सबसे ज्यादा हैरानी की बात यह है कि उस संवेदनशील मौके पर वन विभाग की कोई भी ट्रैकिंग टीम या जिम्मेदार अधिकारी मौके पर मौजूद नहीं था। यह घटना चीतों की सुरक्षा पर पानी की तरह बहाए जा रहे करोड़ों रुपए और उनकी 24 घंटे निगरानी के तमाम दावों की पोल खोलती नजर आती है।
वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस तरह की घटनाएँ आम ग्रामीणों के लिए भी बेहद खतरनाक साबित हो सकती हैं, क्योंकि भारी दबाव और डर की स्थिति में चीता आत्मरक्षा में हमला भी कर सकता है। इस पूरे संवेदनशील मामले पर जब कूनो नेशनल पार्क के डायरेक्टर उत्तम शर्मा और डीएफओ आर. थिरुकुराल से पक्ष जानने के लिए कई बार संपर्क करने का प्रयास किया गया, तो उनकी ओर से कोई प्रतिक्रिया या जवाब नहीं दिया गया।
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