मालवा में कम बारिश और गहराते जल संकट पर पर्यावरणविद् पद्मभूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी की चेतावनी

इंदौर में आयोजित व्याख्यान में प्रख्यात पर्यावरणविद् पद्मभूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने मालवा में कम बारिश और भूजल संकट पर गहरी चिंता जताई।

Aug 08, 2026 - 20:12
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मालवा में कम बारिश और गहराते जल संकट पर पर्यावरणविद् पद्मभूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी की चेतावनी

इंदौर : एक समय मालवा अंचल के लिए एक लोकप्रिय कहावत कही जाती थी— 'मालवा की माटी गहन गंभीर, डग-डग रोटी, पग-पग नीर'। इसका अर्थ यह था कि मालवा की धरती बेहद उपजाऊ होने के साथ-साथ जल से समृद्ध थी, जहाँ कदम-कदम पर शुद्ध पानी मिल जाता था। लेकिन वक्त के साथ अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। इस साल एक बार फिर मालवा क्षेत्र मानसून की बारिश के लिए तरस रहा है। इंदौर और आसपास के क्षेत्रों में इस साल पिछले 10 वर्षों में सबसे कम बारिश दर्ज की गई है, और पिछले साल के बारिश के आंकड़े भी काफी चिंताजनक रहे हैं। विकास की इस अंधी दौड़ और जल, जंगल तथा जमीन के भीषण दोहन का ही यह दुष्परिणाम है कि अब न तो पर्याप्त मात्रा में बारिश हो रही है और न ही भूजल स्तर (Groundwater Level) में कोई सुधार देखने को मिल रहा है।

🗣️ मालवा में कम बारिश और पर्यावरणीय संकट पर विशेष व्याख्यान

इन विकट हालातों में अब समय रहते प्रकृति को संरक्षित करना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी बन चुकी है, अन्यथा आने वाले समय में इसके परिणाम बेहद भयानक होंगे। यह गंभीर चेतावनी प्रख्यात पर्यावरणविद्, हरित कार्यकर्ता एवं हिमालयन पर्यावरण अध्ययन और संरक्षण संगठन (HESCO) के संस्थापक पद्मभूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने दी है। वे इंदौर में 'सेवा सुरभि' संस्था के तत्वावधान में आयोजित ‘क्यों रूठे हुए हैं मेघराज मालवांचल से’ विषयक एक विशेष व्याख्यान कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। इंदौर के तमाम जाने-माने पर्यावरणविदों और सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों के साथ संवाद करते हुए डॉ. जोशी ने कहा कि जिस मालवा क्षेत्र में 'पग-पग रोटी, डग-डग नीर' की पुरानी मान्यता हुआ करती थी, आज वहाँ बारिश का न होना और भूजल संकट का गहराना सीधे तौर पर प्रकृति के साथ हमारे बदलते और लापरवाह व्यवहार का परिणाम है।

🌊 बारिश के लिए केवल बादल नहीं, संपूर्ण प्राकृतिक व्यवस्था है जरूरी

डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने आगे कहा कि हम सभी को जीवित रहने के लिए शुद्ध जल, वायु, जमीन और जंगल चाहिए, इसके बावजूद हमने कभी भी प्रकृति के प्रति अपनी बुनियादी जिम्मेदारियों को ईमानदारी से नहीं निभाया। खेती-किसानी से शुरू हुई मानव सभ्यता की यह यात्रा आज जंगलों के अंधाधुंध दोहन और वन्यजीवों के विनाश तक पहुँच चुकी है। केवल बादलों के आने मात्र से मानसून या बारिश नहीं होती, बल्कि समुद्र से होने वाला वाष्पीकरण, हवाओं का दबाव, ऊँचे पहाड़, सघन जंगल, नदियां और प्राकृतिक जलग्रहण क्षेत्र मिलकर एक संपूर्ण और अचूक प्राकृतिक तंत्र (Natural System) का निर्माण करते हैं। जब इंसानों द्वारा जंगल काटे जाते हैं, नदियाँ सुखाई जाती हैं और जलग्रहण क्षेत्र नष्ट किए जाते हैं, तो उसका सीधा और नकारात्मक असर हमारे भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) पर पड़ता है।

💼 व्यवसाय और स्वार्थ के लिए प्रकृति से खिलवाड़

पर्यावरणविद् ने चिंता जताते हुए कहा कि प्रचुर बारिश होने के बावजूद यदि वह पानी जमीन के भीतर नहीं उतरेगा, तो आने वाले निकट भविष्य में जल संकट और अधिक गहराता चला जाएगा। इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अब फरवरी का महीना ही गर्म होने लगा है और पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश में भी मई-जून के महीनों में मौसम का मिज़ाज पूरी तरह बदल गया है। हमने अपने निजी स्वार्थ, पेट भरने और व्यवसाय के लिए प्रकृति का इस कदर शोषण और दोहन किया है कि आज हमें यह भी ठीक से पता नहीं चल पा रहा है कि हम किस असली मौसम में जी रहे हैं। इसके लिए हम मनुष्य स्वयं पूरी तरह जिम्मेदार हैं। यदि हमें प्रकृति की इस नाराजगी का कोई ठोस समाधान खोजना है, तो समय रहते एक व्यापक पर्यावरणीय मैपिंग (Environmental Mapping) करनी होगी, जिससे यह पता चल सके कि पिछले कुछ दशकों में शहर के पानी, जंगल, मिट्टी, नदियों और प्राकृतिक जलग्रहण क्षेत्रों में वास्तव में क्या बदलाव आए हैं।

💧 जलग्रहण क्षेत्रों को पुनर्जीवित करने पर दिया विशेष जोर

डॉ. जोशी ने जोर देकर कहा कि नदियाँ कभी मरती नहीं हैं, बल्कि कई बार वे इंसानों से रूठकर या तो विलुप्त हो जाती हैं या जमीन के भीतर चली जाती हैं। उन्हें सही मायनों में समझकर और उनके जलग्रहण क्षेत्रों को पुनर्जीवित करके वापस लाया जा सकता है। केवल जगह-जगह पौधे लगाने या पेड़-पौधों की बात करने मात्र से प्रकृति को नहीं बचाया जा सकता। हमें यह देखना होगा कि किसी विशेष स्थान पर प्रकृति ने मूल रूप से किस तरह की व्यवस्था बनाई थी और उसे दोबारा जीवित करने के लिए किन मूल परिस्थितियों को वापस लाना अनिवार्य है। आज के इस गंभीर पारिस्थितिक संकट (Ecological Crisis) के दौर में यह हर एक नागरिक की व्यक्तिगत जिम्मेदारी है कि वह अपने कार्बन फुटप्रिंट पर गंभीरता से विचार करे और अपनी दैनिक जीवनशैली में प्रकृति के प्रति अपनी जवाबदेही खुद तय करे।

⚖️ प्रकृति का संतुलन सुधारने के लिए समाज की व्यापक भागीदारी

उन्होंने स्पष्ट किया कि आर्थिक संकटों के समाधान में सरकार और उद्योगों की मुख्य भूमिका हो सकती है, लेकिन किसी भी पारिस्थितिक संकट का स्थायी समाधान समाज की व्यापक और सक्रिय भागीदारी के बिना कभी संभव नहीं हो सकता। इसलिए पर्यावरण के संरक्षण के लिए एक समग्र दृष्टि की सख्त आवश्यकता है। अब हमें यह समझने की जरूरत है कि हजारों-लाखों वर्षों के लंबे कालखंड में प्रकृति ने जो अपना एक संतुलित सिस्टम विकसित किया था, उसे फिर से सही रास्ते पर कैसे लाया जाए। इसके लिए पहाड़ों और नदियों से लेकर भूजल भंडारों तक पूरी प्राकृतिक व्यवस्था को एक समग्र इकाई के रूप में समझना होगा।

🤝 आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकृति का कर्ज चुकाना होगा

कार्यक्रम के अंत में डॉ. जोशी ने आह्वान किया कि आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल आलीशान मकान, भौतिक सुविधाएँ और संपत्ति छोड़कर चले जाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें जीने के लिए शुद्ध हवा, पानी, मिट्टी और हरे-भरा जंगल भी चाहिए। हम प्रकृति से जितना अधिक उपभोग करेंगे, उतना ही उसके संतुलन के लिए हमें अपना योगदान भी देना होगा। यही आने वाले समय की हमारी सबसे बड़ी और अहम जिम्मेदारी है।

इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में पर्यावरणविद् ओपी जोशी, अतुल शेठ, कुमार सिद्धार्थ, पद्मश्री जनक पलटा, केट के पूर्व वैज्ञानिक निकेतन सेठी, वरिष्ठ अभिभाषक अनिल त्रिवेदी, डॉ. किशोर पंवार, डॉ. भोलेश्वर दुबे, डॉ. दिलीप वाघेला, पंकज कासलीवाल, कमल कलवानी सहित शहर के कई प्रतिष्ठित संगठनों के प्रतिनिधि बड़ी संख्या में शामिल हुए। कार्यक्रम का कुशल संचालन अतुल शेठ ने किया और अंत में आभार प्रदर्शन अनिल त्रिवेदी ने किया।

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