शिप्रा आरती को लेकर महाकाल मंदिर समिति और पंडा पुजारियों में ठनी जंग, रामघाट पर जल सत्याग्रह
उज्जैन के रामघाट पर शिप्रा आरती के अधिकार को लेकर महाकाल मंदिर समिति और पंडे-पुजारियों के बीच बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। विरोध में पुजारी जल सत्याग्रह कर रहे हैं।
उज्जैन : पुजारियों के पहनावे को लेकर पहले ही विवाद देख चुकी धार्मिक नगरी उज्जैन में अब 'आरती' एक नया और बड़ा राजनीतिक-धार्मिक आंदोलन बन गई है। यह विवाद अब इतना अधिक बढ़ चुका है कि इतिहास में पहली बार शिप्रा नदी के घाटों से उतरकर पंडे-पुजारी सीधे जल सत्याग्रह पर बैठ गए हैं। उन्होंने साफ चेतावनी दी है कि अभी तो केवल पंडे पानी में खड़े हैं, लेकिन अगर बात नहीं बनी तो कल उनके परिवार के लोग भी जल सत्याग्रह करने के लिए नदी में उतर जाएंगे। वर्ष 2016 के सिंहस्थ महाकुंभ से ठीक पहले शुरू हुई शिप्रा घाट की आरती को लेकर ऐसा भयंकर उबाल इसके पहले कभी देखने को नहीं मिला था। आखिर इस विवाद के पीछे की असली वजह क्या है, धर्म में धंधे के आरोप कहाँ से लग रहे हैं, शिप्रा आरती का वास्तविक इतिहास क्या है और महाकाल मंदिर समिति व तीर्थ पुरोहितों के बीच टकराव की जड़ कहाँ है—आइए सिलसिलेवार जानते हैं।
🛑 घाट के पुजारी पानी में उतरे, चेतावनी- आज हम हैं कल पूरा परिवार होगा
उज्जैन की पावन शिप्रा आरती इस समय एक बड़े संघर्ष का गवाह बन रही है। उन पंडे-पुजारियों के भीतर भारी गुस्सा साफ झलक रहा है, जो हर साल इसी शिप्रा नदी के तट पर खड़े होकर नियमित रूप से संध्या आरती उतारते आए हैं। वे उसी पवित्र शिप्रा की कसम खाकर जल सत्याग्रह की जिद पर अड़े हुए हैं। उनका कहना है कि वे घाट से तभी हटेंगे जब घाट पर उनकी पुरानी और पारंपरिक जगह उन्हें ससम्मान वापस मिलेगी।
पंडा समिति के अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी पूरे मामले की असलियत बताते हुए कहते हैं, ''पूरा विवाद इस बात को लेकर है कि महाकाल मंदिर समिति अब शिप्रा घाट पर भी अपना पूर्ण एकाधिकार और कब्जा चाहती है। खुलेआम धर्म को एक 'धंधा' और कमर्शियल इवेंट बनाने का काम किया जा रहा है, जिसे हम किसी भी कीमत पर सफल नहीं होने देंगे। जब हम इतने लंबे समय से शिप्रा के तट पर पूरी निष्ठा से आरती कर रहे हैं, तो यदि आप इसे कोई वृहद स्वरूप देना भी चाहते हैं, तो हमें बैठकार योजना बताएं, हम पूरा सहयोग करेंगे। उत्तर प्रदेश के वृंदावन में और काशी में चले जाइए, वहाँ घाटों पर विशेषाधिकार होते हैं। वहाँ बाहर का कोई दूसरा पंडा-पुजारी आकर जबरन पूजा नहीं करा सकता, तो फिर शिप्रा नदी में आरती कोई दूसरा क्यों करेगा? हमें समझाइए कि क्या करना है, हम प्रशासन के साथ मिलकर काम करने को तैयार हैं।''
⚡ शिप्रा आरती को लेकर कैसे भड़का यह पूरा विवाद?
उज्जैन के रामघाट पर पंडा समिति पिछले लगभग 11 वर्षों (यानी 2015 से) से लगातार शिप्रा आरती का संचालन करती आ रही है। लेकिन हाल ही में यह निर्णय लिया गया कि अब यह आरती भी महाकाल मंदिर समिति के प्रबंधकीय नियंत्रण और निर्देशन में करवाई जाएगी। इसकी शुरुआत तब हुई जब महाकाल मंदिर समिति ने सबसे पहले 5 अगस्त को महाकाल थाना और स्थानीय प्रशासन को एक पत्र लिखकर यह माँग की कि उनके बटुकों को रामघाट पर आरती करने के लिए पर्याप्त पुलिस सुरक्षा उपलब्ध कराई जाए।
इसके बाद मंदिर समिति के जिम्मेदार सदस्य महाकाल मंदिर के विशेष बटुकों को लेकर सीधे रामघाट पर जा पहुँचे। यहीं से इस पूरे विवाद की चिंगारी सुलग उठी। पंडा समिति के लोगों ने इसका कड़ा विरोध किया और प्रशासनिक बटुकों को आरती करने से रोक दिया।
जब यह विवाद काफी बढ़ गया, तो बटुकों ने रामघाट के ही एक दूसरे हिस्से में जाकर आरती संपन्न की। अगले दिन 6 अगस्त को स्थिति शांत रही, लेकिन 7 अगस्त को जब फिर से बटुक आरती के लिए रामघाट पहुँचे, तो स्थानीय पंडे-पुजारियों ने उन्हें फिर से रोक दिया। मौके पर पहुँचे प्रशासन और पुलिस अधिकारियों की ओर से काफी समझाइश देने के बाद भी जब बात नहीं बनी, तो पुलिस ने पंडे-पुजारियों पर हल्का बल प्रयोग कर दिया, जिसके बाद मामला पूरी तरह बिगड़ गया। इस बल प्रयोग और कार्रवाई के खिलाफ पुजारियों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया और वे विरोध जताते हुए सीधे शिप्रा नदी में उतरकर जल सत्याग्रह पर बैठ गए।
इस पूरे घटनाक्रम पर अपना पक्ष रखते हुए एसडीएम पवन बारिया का कहना है कि, ''मंदिर समिति का मुख्य उद्देश्य यह है कि शाम की महाआरती अब समिति के माध्यम से संचालित हो। यह विवाद इस बात पर उपजा कि जो पुराने पंडित यहाँ पहले से आरती और पूजन करते आ रहे हैं, उनसे यह निवेदन किया गया था कि वे भी इस व्यवस्था में सहयोग करें। लेकिन 'एकाधिकार' वाली बात को लेकर आपत्ति जताई गई थी, क्योंकि किसी एक व्यक्ति का आरती पर हमेशा के लिए व्यक्तिगत अधिकार नहीं हो सकता। आपको भी प्रशासनिक व्यवस्था का सहयोग करना चाहिए। जैसा कि हुआ भी, बटुकों ने पूरे विधि-विधान और मंत्रोच्चार के साथ आरती की। आगे भी मंदिर समिति नगर निगम और पुलिस प्रशासन के सहयोग से यह धार्मिक आयोजन जारी रखेगी।''
🏢 महाकाल मंदिर समिति द्वारा आरती के अधिकार अपने हाथ में लेने की वजह
आखिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि महाकाल मंदिर समिति को शिप्रा आरती के अधिकार अपने नियंत्रण में लेने पड़े? असल में, बनारस के दशाश्वमेध घाट से लेकर वृंदावन तक जिस तरह से गंगा और यमुना की महाआरती अब एक भव्य धार्मिक-सांस्कृतिक 'इवेंट' का रूप ले चुकी है, ठीक उसी तर्ज पर महाकाल मंदिर समिति आगामी सिंहस्थ महाकुंभ से पहले रामघाट की शिप्रा आरती को भी वैसा ही विशाल और भव्य रूप देने की तैयारी कर रही है।
इस संबंध में एसडीएम पवन बारिया का यह भी कहना है कि, ''मुख्य बात इस आरती को भव्यता प्रदान करने की है। देश के अन्य प्रसिद्ध धार्मिक घाटों का अध्ययन करने के बाद यह एकरुपता देखने में आई कि अधिकांश प्रमुख स्थानों पर मंदिर समितियों या ट्रस्टों के माध्यम से ही सामूहिक रूप से आरती की जाती है। वही मॉडल अब उज्जैन में भी लागू किया जा रहा है, लेकिन स्थानीय पुजारी इसमें सहयोग करने को तैयार नहीं हैं।''
सूत्रों के अनुसार, इसके पीछे एक बड़ा कारण यह भी है कि उज्जैन स्मार्ट सिटी विकास योजना के तहत इस आरती को एक भव्य धार्मिक और सांस्कृतिक इवेंट के रूप में पर्यटकों के सामने प्रस्तुत करने की योजना है। इसके लिए विधिवत टेंडर भी जारी किए गए हैं और इसे पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मोड पर संचालित करने तथा एक ब्रांड के रूप में इसकी देश-दुनिया में मार्केटिंग करने की पूरी तैयारी चल रही है।
📜 क्या है शिप्रा आरती का पौराणिक और आधुनिक इतिहास?
पुराने पुजारियों में शामिल पुजारी महेश बताते हैं कि, ''वर्ष 1980 के दशक में ही शिप्रा के घाटों पर आरती की शुरुआत हो चुकी थी। वैसे तो माँ शिप्रा की आराधना अनादिकाल से चली आ रही है, लेकिन वर्ष 2015 में सिंहस्थ महाकुंभ से ठीक एक साल पहले इसे एक व्यापक और व्यवस्थित 'वृहद रूप' दिया गया था। उस समय के तत्कालीन कलेक्टर कवीन्द्र कियावत ने पहल करते हुए यह कहा था कि चूँकि देश-दुनिया से लाखों श्रद्धालु उज्जैन आते हैं, इसलिए इस आरती को भव्य रूप दिया जाना चाहिए।
पंडा समिति के माध्यम से ही इसे तब भव्य स्वरूप प्रदान किया गया था। तब से लेकर आज तक पिछले ग्यारह वर्षों में ऐसा कभी नहीं हुआ कि शिप्रा घाट की आरती को लेकर किसी भी स्तर पर कोई सवाल या विवाद खड़ा हुआ हो।''
⚠️ आरोप: यह आस्था नहीं बल्कि धर्म को 'धंधा' बनाने का कुचक्र
दूसरी तरफ, पंडा-पुजारी संघ शिप्रा आरती के इस बदले हुए कमर्शियल स्वरूप का लगातार कड़ा विरोध कर रहा है। पुजारी महेश का आरोप है कि, ''आरती कोई कॉर्पोरेट इवेंट या तमाशा नहीं है। यह सीधे तौर पर शुद्ध धर्म को एक 'धंधा' और मुनाफा कमाने का उपक्रम बनाने की कोशिश है। आरती हमेशा से पूर्ण रूप से हमारी अगाध आस्था और विश्वास का विषय रही है, इसे आप रातों-रात किसी इवेंट में कैसे तब्दील कर सकते हैं? जो हमारी प्राचीन सनातन परंपरा चली आ रही है और जो कार्य हमारे पूर्वज करते आए हैं, वही आगे भी होगा। हम किसी भी कीमत पर अपना घाट और अपनी परंपरा नहीं छोड़ेंगे।''
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