रायसेन में जान जोखिम में डालकर पढ़ रहे बच्चे, 51 से अधिक स्कूल भवन जर्जर हालत में

रायसेन जिले में 50 से अधिक सरकारी स्कूल भवन जर्जर हालत में हैं, जबकि कई स्कूलों के पास अपने भवन ही नहीं हैं। बजट के अभाव में बच्चों की जान पर खतरा मंडरा रहा है।

Aug 09, 2026 - 20:25
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रायसेन में जान जोखिम में डालकर पढ़ रहे बच्चे, 51 से अधिक स्कूल भवन जर्जर हालत में

रायसेन: "जान है तो जहान है" की यह कहावत मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के कई सरकारी स्कूलों पर बिल्कुल सटीक बैठती है, जहाँ मासूम बच्चे अपनी जान को हथेली पर रखकर जर्जर और खतरनाक इमारतों के साये में पढ़ाई करने को मजबूर हैं। जिले में 51 से अधिक सरकारी स्कूल भवन ऐसे हैं जो पूरी तरह जर्जर हालत में पहुँच चुके हैं, जबकि 20 से ज्यादा स्कूल ऐसे हैं जिनके पास अपने खुद के भवन ही नहीं हैं। कई स्कूलों में हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि बारिश के दिनों में छतों से लगातार पानी टपकता है, जिससे बच्चों का वहाँ बैठना तो दूर, टिकना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसी स्थिति में कई बार मजबूरीवश शिक्षकों को स्कूल की छुट्टी तक करनी पड़ जाती है।

🗂️ ठंडे बस्ते में पड़े मरम्मत और पुनर्निर्माण के प्रस्ताव

जिला शिक्षा केंद्र की ओर से जिले के 300 से अधिक जर्जर स्कूल भवनों की मरम्मत और उनके पुनर्निर्माण के लिए राज्य शिक्षा केंद्र को विधिवत प्रस्ताव भेजे गए थे, लेकिन इनमें से मात्र कुछ ही स्कूलों की मरम्मत और नवनिर्माण कार्यों को हरी झंडी मिल पाई है। जबकि 300 से ज्यादा स्कूलों के प्रस्ताव अब भी प्रशासनिक स्वीकृति के इंतजार में लंबित पड़े हैं। इसके चलते मासूम बच्चों के जीवन पर हर समय एक बड़ा खतरा मंडरा रहा है।

राज्य शिक्षा केंद्र के सब इंजीनियर विनोद राजपूत ने इस संबंध में जानकारी देते हुए बताया कि, "जिले के 325 स्कूलों की मरम्मत और 10 भवनों के पुनर्निर्माण के लिए उच्च स्तर पर बजट की माँग की गई थी, जिसमें से हाल ही में केवल कुछ ही स्कूलों की मरम्मत और दो नए भवनों के निर्माण की स्वीकृति प्राप्त हुई है। जैसे ही शेष बजट आवंटित होगा, आगे के निर्माण कार्य तेजी से शुरू किए जाएंगे।"

🏆 राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त उत्कृष्ट स्कूल की भी दयनीय स्थिति

जिले के एक ऐसे स्कूल की हालत भी बेहद दयनीय बनी हुई है, जिसके शिक्षक नीरज सक्सेना को वर्ष 2022 में शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान और नवाचार के लिए देश का प्रतिष्ठित 'राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार' मिल चुका है, और वर्ष 2020 में केंद्रीय इस्पात मंत्रालय द्वारा इस पर एक विशेष डॉक्यूमेंट्री भी बनाई जा चुकी है। लगभग 100 विद्यार्थियों की संख्या वाले इस स्कूल में बैठने के लिए मात्र दो ही छोटे कमरे उपलब्ध हैं, जिनकी कुल क्षमता सिर्फ 40 बच्चों की है।

पर्याप्त जगह न होने के कारण शिक्षकों को मजबूरन बच्चों को पेड़ों के नीचे बैठाकर पढ़ाना पड़ता है, जबकि बारिश के मौसम में छोटे कमरों में बच्चों की भीड़ के कारण पढ़ाई का माहौल पूरी तरह प्रभावित होता है। सम्मानित शिक्षक नीरज सक्सेना का कहना है कि, "उन्होंने अतिरिक्त कक्षाओं के निर्माण के लिए वरिष्ठ अधिकारियों को कई बार लिखित पत्र लिखे हैं, लेकिन अभी तक इस समस्या का कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है।"

🏡 दलान और आँगन में भविष्य तलाशने को मजबूर बच्चे

जिले के ऐटखेड़ी ग्राम के अंतर्गत आने वाले उमरई टोला प्राथमिक स्कूल का हाल तो इससे भी ज्यादा बेहाल है। अपना खुद का भवन न होने के कारण यहाँ के लगभग 20 छोटे-छोटे बच्चे किसी अन्य व्यक्ति के घर की दलान (बरामदे) या कभी खुले आँगन में बैठकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं। शिक्षक द्वारा बार-बार आवेदन देने के बावजूद बजट स्वीकृत न होने के कारण इस स्कूल को अपना भवन नसीब नहीं हो पाया है, जिसके चलते यह विद्यालय पूरी तरह से वैकल्पिक और दयनीय व्यवस्थाओं के सहारे ही संचालित हो रहा है।

⚠️ अन्य क्षेत्रों के स्कूलों में भी बदतर हालात, बजट का इंतजार

कुछ ऐसी ही बदहाल स्थिति उदयपुरा संकुल के थवरी और ईतखेड़ी संकुल के बाबानबाड़ा स्कूल की भी है, जहाँ देश के नौनिहाल बेहतर शिक्षा के लिए अपने खुद के भवन को तरस रहे हैं। जिले के 300 से अधिक जर्जर स्कूल भवनों की मरम्मत और खतरनाक हो चुकी इमारतों के पुनर्निर्माण को लेकर जब राज्य शिक्षा केंद्र के सब इंजीनियर विनोद राजपूत से दोबारा चर्चा की गई, तो उन्होंने दोहराया कि विभाग द्वारा लगातार पत्राचार किया जा रहा है और बजट मिलते ही युद्ध स्तर पर मरम्मत व नवनिर्माण के कार्य कराए जाएंगे।

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