मध्य प्रदेश सरकार का बड़ा फैसला, बाहरी मजदूरों को मिलने वाले वनोपज बोनस पर लग सकती है रोक
मध्य प्रदेश सरकार वनोपज के बोनस को लेकर बड़ा बदलाव करने जा रही है। अब तेंदुपत्ता और अन्य वनोपज का बोनस सिर्फ स्थानीय मजदूरों और आदिवासियों को ही मिलेगा।
मध्य प्रदेश के अन्य राज्यों से आकर यहाँ कार्य करने वाले और एससी-एसटी वर्ग के स्थानीय लोगों का हक मारने वाले बाहरी मजदूरों की सुविधाओं पर अब राज्य सरकार शिकंजा कसने जा रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में हाल ही में संपन्न हुई कैबिनेट बैठक में इस महत्वपूर्ण विषय पर विस्तृत चर्चा की गई है। सरकार की योजना के अनुसार, जंगलों से एकत्रित किए जाने वाले वनोपज पर मिलने वाले बोनस और लाभांश की राशि अब केवल और केवल मध्य प्रदेश के मूल स्थानीय मजदूरों तथा संग्राहकों को ही प्रदान की जाएगी, जिससे बाहरी राज्यों से आने वाले श्रमिकों को इस लाभ से वंचित किया जा सके।
🌳 वनों से तेंदुपत्ता और महुआ इकट्ठा करने वाले स्थानीय मजदूरों की स्थिति
मध्य प्रदेश के समृद्ध वनों से बड़ी संख्या में ग्रामीण और आदिवासी वर्ग के लोग तेंदुपत्ता, महुआ, हर्र, बहेड़ा, चिरौंजी जैसी बहुमूल्य लघु वनोपज को एकत्रित करते हैं। यह पूरा कार्य मध्य प्रदेश राज्य लघु वनोपज संघ के माध्यम से स्थानीय समितियों के जरिए संचालित होता है। अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य स्थानीय वर्ग के मजदूर इन उत्पादों को इकट्ठा कर वनोपज संघ को सौंपते हैं, जिसके एवज में उन्हें प्रतिदिन की तय मजदूरी दी जाती है।
इन वनोपज के व्यापार और विक्रय से होने वाले कुल मुनाफे को समितियों द्वारा बोनस के रूप में बांटा जाता है। इस व्यवस्था के तहत 60 प्रतिशत हिस्सा सीधे वनोपज इकट्ठा करने वाले आदिवासियों और स्थानीय संग्राहकों के बैंक खातों में भेजा जाता है, जबकि 20 फीसदी राशि जंगलों के विकास और शेष 20 फीसदी राशि संग्राहकों के कल्याणकारी कार्यों पर खर्च की जाती है।
🚫 बाहरी मजदूरों को लाभांश देने की व्यवस्था पर लगेगी रोक
अब तक की व्यवस्था के तहत मध्य प्रदेश के जंगलों में वनोपज तोड़ने और इकट्ठा करने के लिए पड़ोसी राज्यों से भी बड़ी संख्या में मजदूर आते थे। इन बाहरी मजदूरों को भी दैनिक मजदूरी के साथ-साथ लाभांश और बोनस का हिस्सा मिलता रहा है। लेकिन अब राज्य सरकार इस नियम में बड़ा बदलाव करने जा रही है।
कैबिनेट बैठक के बाद जानकारी देते हुए मंत्री राव उदय प्रताप सिंह ने स्पष्ट किया कि इस विषय पर कैबिनेट में गंभीर चर्चा हुई है और सरकार इस दिशा में आगे बढ़ रही है कि वनोपज समितियों के माध्यम से मिलने वाला लाभांश केवल उन्हीं मजदूरों और स्थानीय निवासियों को मिले जो यहीं के मूल निवासी हैं। हालांकि, इस पर अभी औपचारिक और अंतिम मुहर लगना बाकी है, लेकिन सरकार का यह कदम स्थानीय आदिवासियों और मजदूरों के हितों को सुरक्षित रखने की दिशा में एक बड़ा प्रयास माना जा रहा है।
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