प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को भेजी जाएंगी बुरहानपुर के रेशों से बनी राखियां, महिलाएं बन रहीं आत्मनिर्भर

बुरहानपुर की महिलाओं ने केले के तनों के वेस्टेज से ईको-फ्रेंडली राखियां बनाई हैं। नासिक और स्थानीय बाजारों से बड़े ऑर्डर मिलने के साथ ही ये राखियां सैनिकों को भी भेजी जा रही हैं।

Aug 11, 2026 - 16:38
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प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को भेजी जाएंगी बुरहानपुर के रेशों से बनी राखियां, महिलाएं बन रहीं आत्मनिर्भर

मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले में कृषि अपशिष्ट (वेस्टेज) से आत्मनिर्भरता की एक अद्भुत और प्रेरणादायक तस्वीर सामने आ रही है। कुछ साल पहले तक जिस केले के तनों को किसान केवल बेकार समझकर फेंक देते थे, आज उसी वेस्टेज से जिले की स्व-सहायता समूह की महिलाओं ने 'बेस्ट' चीजें तैयार कर मिसाल कायम कर दी है। नाबार्ड और मध्य प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) से विशेष प्रशिक्षण प्राप्त कर महिलाओं ने केले के रेशों से टोपी, झाड़ू, चटाई और साड़ियों के बाद अब पर्यावरण के अनुकूल (ईको-फ्रेंडली) खूबसूरत राखियां बनानी शुरू कर दी हैं, जिनकी मांग अब दूसरे राज्यों तक पहुँच चुकी है।

📦 शाहपुर की महिलाओं को मिला नासिक से ऑर्डर, सैनिकों को भी भेजी जाएंगी राखियां

बुरहानपुर के शाहपुर स्थित 'तेजश्री महिला एवं सामाजिक विकास समिति' की महिलाओं को इस रक्षाबंधन के अवसर पर महाराष्ट्र के नासिक से ढाई हजार ईको-फ्रेंडली राखियों का बड़ा ऑर्डर प्राप्त हुआ है। समूह की महिलाओं ने शुरुआती चरण में 1 हजार राखियाँ तैयार कर भेज दी हैं और 800 अतिरिक्त राखियों का निर्माण किया है। इसके अलावा स्थानीय स्तर पर भी 2 हजार राखियों की मांग पूरी की जा रही है। खास बात यह है कि बुरहानपुर में बनी ये पर्यावरण-अनुकूल राखियाँ देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ-साथ सीमाओं पर तैनात लगभग 200 जवानों को भी भेजी जा रही हैं। इन राखियों की विशेषता यह है कि उपयोग के बाद फेंकने पर इनसे किसी भी प्रकार का प्रदूषण नहीं होता है।

🌾 'एक जिला एक उत्पाद' योजना और किसानों को दोहरा लाभ

तत्कालीन कलेक्टर भव्या मित्तल के कार्यकाल के दौरान बुरहानपुर की केला फसल को 'एक जिला एक उत्पाद' (ODOP) योजना के तहत शामिल किया गया था, जिसके बाद से केले के साथ-साथ इसके वेस्टेज की मांग में भी भारी इजाफा हुआ है। महिलाएं किसानों से केले के तने खरीदती हैं, जिन्हें मशीनों के जरिए रेशे निकालकर धूप में सुखाया जाता है। इन रेशों से विभिन्न घरेलू और सजावटी उत्पाद तैयार किए जाते हैं। मास्टर ट्रेनर उषा उदलकर और समिति की मेघा चौधरी ने बताया कि साल 2018 से शुरू हुए इस कार्य से क्षेत्र की गृहणियों को घर बैठे रोजगार मिल रहा है, जिससे चार दीवारों में सिमटी महिलाएं आज आर्थिक रूप से पूरी तरह आत्मनिर्भर बन चुकी हैं।

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