खंडवा का अनोखा किसान: घास में आम पकाकर पेश की मिसाल, मंडी जाने की जरूरत नहीं, घर पर ही बिक रहे 10 क्विंटल फल
खंडवा के किसान मोहन पटेल ने रसायनों को छोड़ अपनाया प्राकृतिक तरीका। घास में पका रहे दशहरी और लंगड़ा आम। बाजार जाए बिना रोजाना बिक रहे 10 क्विंटल आम।
खंडवा। आज के दौर में जब फलों को जल्दी पकाने के लिए खतरनाक रसायनों (केमिकल्स) का इस्तेमाल आम बात हो गई है, वहीं खंडवा के जसवाड़ी गांव से एक प्रेरणादायक मिसाल सामने आई है। यहाँ के किसान मोहन पटेल रसायनों का उपयोग किए बिना केवल घास की मदद से आम पका रहे हैं। उनके द्वारा उगाए गए प्राकृतिक आमों की मांग इतनी बढ़ गई है कि उन्हें अपना माल बेचने के लिए मंडी या बाजार जाने की जरूरत ही नहीं पड़ती।
घास की गर्माहट और प्राकृतिक प्रक्रिया
किसान मोहन पटेल के खेत में दशहरी, लंगड़ा और देशी किस्म के करीब 40 आम के पेड़ हैं। आमों को पकाने की उनकी प्रक्रिया पूरी तरह से पारंपरिक है। पटेल बताते हैं कि आम को तोड़ने के बाद उसे अच्छी तरह सुखाकर एक कमरे में घास के बीच रखा जाता है। घास की प्राकृतिक गर्माहट से आम धीरे-धीरे पकते हैं, जिससे उनकी ताजगी, सुगंध और असली मिठास बरकरार रहती है। इसमें किसी भी कृत्रिम तकनीक का उपयोग नहीं किया जाता है।
बिना बाजार पहुंचे रोजाना 10 क्विंटल की बिक्री
इन आमों की गुणवत्ता का ही नतीजा है कि ग्राहक खुद चलकर खेत और गोदाम तक पहुंच रहे हैं। मोहन पटेल के पास रोजाना करीब 10 क्विंटल आमों की बिक्री हो रही है। गांव की सड़क किनारे सजी आम की टोकरियों को देखकर ही राहगीर रुक जाते हैं और हाथों-हाथ फल खरीद लेते हैं। बाजार के कृत्रिम रूप से पकाए गए आमों की तुलना में यहां के आमों की मांग अत्यधिक है।
ग्राहकों को भा रहा प्राकृतिक स्वाद
नियमित ग्राहक मयूर राजपुर का कहना है कि "घास में पके आमों का स्वाद और सुगंध एकदम अलग और लाजवाब है। प्राकृतिक तरीके से पके होने के कारण हम बेझिझक इन्हें परिवार और रिश्तेदारों को भी भेजते हैं।" मोहन पटेल का यह प्रयास न केवल स्वास्थ्य के प्रति लोगों को जागरूक कर रहा है, बल्कि यह भी साबित कर रहा है कि यदि कृषि में ईमानदारी और पारंपरिक तरीकों को अपनाया जाए, तो मुनाफा दोगुना हो सकता है।
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