गौर क्रीड़ा परिसर के आदिवासी छात्रों को नहीं मिल रहा मेन्यू के अनुसार भोजन, दूध-अंडे और फल गायब
जबलपुर के तिलहरी स्थित शासकीय आदिवासी बालक क्रीड़ा परिसर में छात्रों को निर्धारित मेन्यू के अनुसार दूध, अंडे और फल न मिलने की शिकायत सामने आई है।
मध्य प्रदेश के जबलपुर स्थित गौर क्षेत्र के तिलहरी स्थित शासकीय आदिवासी बालक क्रीड़ा परिसर में रहकर पढ़ाई और खेल का अभ्यास करने वाले आदिवासी विद्यार्थियों को निर्धारित मेन्यू के अनुसार भरपेट और पौष्टिक भोजन नहीं मिलने की गंभीर शिकायत सामने आई है। क्रीड़ा परिसर में व्यवस्थाओं की भारी भरमार है और तय नियमों को पूरी तरह दरकिनार किया जा रहा है। बच्चों का आरोप है कि उन्हें शासन के निर्धारित मेन्यू के तहत दूध, घी, फल और अंडे जैसी आवश्यक और पौष्टिक चीजें नियमित रूप से उपलब्ध नहीं कराई जा रही हैं, जिससे उनके स्वास्थ्य और खेल प्रशिक्षण पर भी बुरा असर पड़ रहा है।
🥚 नियमित रूप से नहीं मिलते अंडे और फल, हर दो दिन की बजाय हफ्ते में एक बार मिल रहा नॉनवेज
नियमों के मुताबिक, क्रीड़ा परिसर में रहने वाले बच्चों को पोषण के लिए नियमित रूप से एक फल और अंडा दिया जाना अनिवार्य है। इसमें भी कक्षा 9वीं से 12वीं तक के बड़े बच्चों को दिन में दो अंडे तथा 6वीं से 8वीं तक के छोटे बच्चों को एक अंडा मिलना चाहिए, लेकिन बच्चों का कहना है कि उन्हें ये चीजें लगातार नहीं मिलतीं। इसके अलावा, निर्धारित व्यवस्था के तहत हर दो दिन में नॉनवेज (मांसाहारी भोजन) दिए जाने का प्रावधान है, लेकिन स्थिति यह है कि सप्ताह में बमुश्किल एक बार ही नॉनवेज मिल पाता है। मेस में दूध और घी की उपलब्धता भी काफी कम और अपर्याप्त है। हॉस्टल की मेस में चार पुरुष कर्मचारी कार्यरत हैं, फिर भी बच्चों को मीनू के हिसाब से भोजन नहीं मिल रहा है।
💰 करोड़ों के भारी-भरकम बजट के बावजूद व्यवस्थाएं लाचार, फ्रिज में नहीं रहता खाद्य सामग्री का स्टॉक
सरकारी संस्थानों या हॉस्टल्स में कुव्यवस्था और बदहाली के पीछे अक्सर बजट की कमी का रोना रोया जाता है, लेकिन मध्य प्रदेश के आदिवासी छात्रावासों की तस्वीर इसके बिल्कुल उलट है। यहाँ प्रति छात्र-छात्रा के हिसाब से प्रतिमाह भारी बजट निर्धारित किया जाता है और सरकार की तरफ से अनाज भी पूरी तरह मुफ्त व अलग से उपलब्ध कराया जाता है। इसके बावजूद कई छात्रावासों में घटिया भोजन, खाने में कीड़े मिलने और दूषित पेयजल की शिकायतें आए दिन सामने आती रहती हैं। केवल तेल, मसालों और सब्जियों जैसी रसोई सामग्री पर ही हर महीने लाखों-करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। वित्तीय वर्ष 2026-27 में आदिवासी कल्याण के लिए 47,429 करोड़ रुपये का बड़ा प्रावधान किया गया है, जो राज्य के कुल बजट का लगभग 25.8 प्रतिशत है। इसके बावजूद जब परिसर के फ्रिज की पड़ताल की गई, तो वहां बच्चों की जरूरत के मुताबिक खाद्य सामग्री का पर्याप्त स्टॉक नदारद मिला।
👤 वार्डन की अनियमित उपस्थिति और सीएम हेल्पलाइन तक पहुंची शिकायतें
इस क्रीड़ा परिसर में लगभग 100 मेधावी बच्चे निवासरत हैं, लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह है कि हॉस्टल के वार्डन नियमित रूप से परिसर में मौजूद नहीं रहते। वार्डन की अनुपस्थिति के कारण बच्चों की भोजन व्यवस्था, उनकी दैनिक जरूरतों और अनुशासन की निगरानी करने वाला कोई जिम्मेदार अधिकारी मौके पर नहीं होता। बच्चों की देखरेख और गुणवत्तापूर्ण भोजन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी जिन अधिकारियों की है, उनकी घोर लापरवाही उजागर हुई है। इस संबंध में परेशान छात्रों और अभिभावकों द्वारा मुख्यमंत्री हेल्पलाइन (CM Helpline) तक शिकायत दर्ज कराई जा चुकी है। खेल परिसर में रहने वाले इन विद्यार्थियों को पढ़ाई के साथ-साथ कठोर खेल प्रशिक्षण भी लेना पड़ता है, इसलिए उन्हें पर्याप्त पोषण मिलना बेहद जरूरी है। इस मामले में संबंधित अधिकारियों से जब पक्ष लिया गया, तो उनका कहना था कि वे तय बजट और मेन्यू के अनुरूप ही भोजन उपलब्ध कराते हैं, बहरहाल उच्च स्तरीय जांच के बाद ही सच्चाई सामने आ सकेगी।
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