भागीरथपुरा दूषित पानी कांड की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने पर हाईकोर्ट की रोक, 8 सितंबर को होगी अगली सुनवाई
इंदौर के भागीरथपुरा दूषित पानी कांड की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने पर हाईकोर्ट की युगलपीठ ने रोक लगा दी है। मामले में अब अगली सुनवाई 8 सितंबर को होगी।
मध्य प्रदेश के चर्चित इंदौर भागीरथपुरा दूषित पानी कांड को लेकर एक सदस्यीय जांच आयोग की रिपोर्ट फिलहाल सार्वजनिक नहीं की जाएगी। हाईकोर्ट की युगलपीठ ने इस रिपोर्ट को सार्वजनिक करने पर रोक लगा दी है। भागीरथपुरा मामले को लेकर हाईकोर्ट में चल रही आधा दर्जन जनहित याचिकाओं पर मंगलवार को एक साथ सुनवाई हुई। अदालत के इस आदेश के बाद अब रिपोर्ट को ओपन करने पर रोक लग गई है, हालांकि मामले से जुड़े वकीलों को प्रिंसिपल रजिस्ट्रार के समक्ष रिपोर्ट का अवलोकन करने और नोट्स बनाने की अनुमति दी गई है। इस मामले में अगली सुनवाई अब 8 सितंबर को तय की गई है।
🏛️ वकीलों के बीच तीखी बहस—एक पक्ष ने बताया जनहित तो दूसरे ने मीडिया ट्रायल की जताई आशंका
सुनवाई के दौरान एक याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अजय बागडिया ने रिपोर्ट को सार्वजनिक किए जाने पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने तर्क दिया कि यदि जांच रिपोर्ट सार्वजनिक हो जाती है, तो याचिका का मूल उद्देश्य समाप्त हो जाएगा और रिपोर्ट का मीडिया ट्रायल शुरू हो जाएगा, साथ ही उन्होंने मामले की सुनवाई के सोशल मीडिया पर चल रहे सीधे प्रसारण को भी रोके जाने की मांग की। इसके विपरीत, अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से एडवोकेट मनीष यादव और रितेश इनाणी ने इसका विरोध करते हुए कहा कि यह एक गंभीर जनहित का मामला है और रिपोर्ट सार्वजनिक होने से यह पता चल सकेगा कि किसकी लापरवाही से 36 लोगों की जान गई।
🔍 क्या थे आयोग की जांच के मुख्य बिंदु? दिसंबर-जनवरी में दूषित पानी से हुई थी 36 मौतें
गौरतलब है कि गत दिसंबर-जनवरी माह के दौरान इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी पीने की वजह से 36 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई थी, जिसके बाद हाईकोर्ट के निर्देश पर एक सदस्यीय जांच आयोग का गठन किया गया था। इस आयोग को कई अहम बिंदुओं पर जांच करनी थी, जिसमें पानी दूषित होने का मुख्य कारण (सीवेज मिलना या पाइपलाइन क्षति), दूषित पानी से होने वाली बीमारियां, मौतों की वास्तविक संख्या, प्रभावितों के लिए मुआवजे का निर्धारण और सबसे अहम—इस त्रासदी के लिए प्रथमदृष्टया जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों की पहचान करना शामिल था। अब रिपोर्ट के सार्वजनिक न होने से दोषी अधिकारियों के नाम फिलहाल सीलबंद लिफाफे में ही सुरक्षित हैं।
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