Chhindwara Farming News: मानसून की देरी से छिंदवाड़ा के किसानों की बढ़ी चिंता, खराब हो रही मक्के की फसल; दोबारा बोनी का संकट

छिंदवाड़ा में मानसून की बेरुखी से मक्के की फसल बर्बाद। किसान दोबारा बोनी के संकट में, लाखों का नुकसान। जानें क्या है कृषि विशेषज्ञों की सलाह।

Jun 21, 2026 - 16:41
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Chhindwara Farming News: मानसून की देरी से छिंदवाड़ा के किसानों की बढ़ी चिंता, खराब हो रही मक्के की फसल; दोबारा बोनी का संकट

छिंदवाड़ा। छिंदवाड़ा जिले में मानसून की देरी ने किसानों की नींद उड़ा दी है। महंगे बीज और खाद का उपयोग कर बोनी कर चुके किसान अब अपनी फसल को सूखते देख चिंता में हैं। जिले में लगभग 70 प्रतिशत किसानों ने मक्का की बुवाई कर दी है, लेकिन बारिश न होने के कारण अब बीज खराब होने की कगार पर हैं। कई इलाकों में तो किसानों को अब दोबारा बोनी की तैयारी करनी पड़ रही है, जिससे उनकी आर्थिक लागत दोगुनी हो गई है।

🚜 दोहरा नुकसान: लाखों की लागत और उत्पादन में कमी

किसान आनंद राजपूत का कहना है कि हर साल 20-22 जून तक मानसून आ जाता है, जिसे देखते हुए किसान 8-9 जून से ही बुवाई शुरू कर देते हैं। इस बार भी प्री-मानसून की हल्की बारिश के भरोसे बुवाई की गई थी, लेकिन उसके बाद बारिश गायब हो गई। किसानों के अनुसार, एक एकड़ में मक्का लगाने की शुरुआती लागत 10 से 12 हजार रुपये आती है। दोबारा बोनी करने से न केवल यह पैसा बर्बाद हो रहा है, बल्कि देर से बोनी करने के कारण उपज भी कम होने की आशंका है।

🧑‍🔬 क्या कहते हैं कृषि विशेषज्ञ?

कृषि अनुसंधान केंद्र छिंदवाड़ा के मौसम वैज्ञानिक डॉ. संत कुमार शर्मा ने बताया कि इस बार मानसून की गति धीमी है और मध्य प्रदेश में इसके 25-26 जून तक सक्रिय होने की संभावना है। उन्होंने किसानों को सलाह दी है कि जब तक मानसून पूरी तरह सक्रिय न हो जाए, तब तक बोनी से बचें। वहीं, कृषि विभाग के उप-संचालक जितेंद्र कुमार सिंह ने स्पष्ट किया कि विभाग बार-बार किसानों को मानसून सक्रिय होने के बाद ही बुवाई की समझाइश देता है, लेकिन परंपरा और नक्षत्रों के भरोसे किसान अक्सर समय से पहले बुवाई कर देते हैं।

👵 'सूखे पांस' की पुरानी परंपरा और अलनीनो का असर

जिले के अनुभवी किसान खूबचंद डेहरिया बताते हैं कि 'मृग नक्षत्र' (8 से 22 जून) में सूखे खेतों में बोनी करना एक पुरानी परंपरा है, जिसे 'सूखे पांस की बोनी' कहा जाता है। पहले यह तरीका कारगर होता था, लेकिन इस बार 'अलनीनो' के प्रभाव के कारण मानसून में देरी हुई है, जिसने किसानों का पूरा गणित बिगाड़ दिया है। अब देखना यह है कि मानसून की सक्रियता किसानों के चेहरों पर कब मुस्कान लाती है।

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