तमराई मोहल्ला निवासी नीलेश ताम्रकर की अंतिम विदाई बनी मिसाल, चित्रकूट के अस्पताल की टीम ने कराई प्रक्रिया
छतरपुर में रक्षाबंधन के दिन एक व्यक्ति के निधन के बाद परिवार ने नेत्रदान करने का फैसला किया। उनकी इस पहल से दो लोगों की जिंदगी रोशन हो गई है।
मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले से रक्षाबंधन के पावन पर्व पर एक अत्यंत भावुक और प्रेरणादायक मामला सामने आया है। जहाँ एक तरफ त्योहार की खुशियां मातम में बदल गईं, वहीं दूसरी तरफ एक बहन और उसके परिजनों ने अपने असहनीय दुख को मानव सेवा की एक ऐसी मिसाल में बदल दिया जो लंबे समय तक समाज को राह दिखाएगी। शहर के तमराई मोहल्ला निवासी 63 वर्षीय नीलेश ताम्रकर का रक्षाबंधन के दिन लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया था। इस गहरे शोक के बीच उनकी बहन और परिजनों ने साहस का परिचय देते हुए नीलेश का नेत्रदान करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया।
🏥 चित्रकूट के सद्गुरु नेत्र चिकित्सालय की टीम ने पूरी की प्रक्रिया, परिवार ने जलाई उम्मीद की लौ
नीलेश ताम्रकर के निधन के बाद जब घर में रोना-पीटोर और मातम का माहौल था, तभी परिजनों ने समाज के लिए एक अनूठी मिसाल पेश करने का फैसला किया। पीड़ित परिवार ने तुरंत चित्रकूट स्थित प्रसिद्ध सद्गुरु नेत्र चिकित्सालय से संपर्क साधा। सूचना मिलते ही अस्पताल की चिकित्सकीय टीम तुरंत छतरपुर पहुँची। डॉ. विशाल रजक और उनके सहयोगियों ने पूरी चिकित्सा प्रक्रिया का पालन करते हुए नीलेश ताम्रकर का नेत्रदान सफलताપूर्वक संपन्न कराया। उनकी यह आंखें अब उन दो जरूरतमंद लोगों की जिंदगी में उजाला भरेंगी, जो दुनिया देखने के लिए तरस रहे हैं।
💬 "भाई जाते-जाते भी दो लोगों के लिए छोड़ गए हैं रोशनी": समाजसेवी और परिजनों के भावुक शब्द
स्थानीय समाजसेवी गिरजा पाटकर ने इस कदम की सराहना करते हुए कहा कि नेत्रदान की असल खूबसूरती यही है कि इंसान भले ही दुनिया से चला जाए, लेकिन उसकी आंखें किसी और को यह खूबसूरत दुनिया देखने का अवसर दे जाती हैं। मृतक की बहन शिल्पी ने बेहद भावुक होते हुए कहा, "आज मेरे लिए बहुत दुख का दिन है, लेकिन मुझे गर्व है कि मेरे भाई ने दुनिया से जाते-जाते भी दो अन्य लोगों की जिंदगी में उजाला कर दिया है। इससे बड़ी संतोष की बात और क्या हो सकती है।" परिवार के इस साहसी और संवेदनशील निर्णय की पूरे शहर में सराहना हो रही है।
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