पंचायतों और स्कूलों को बांटी गई वॉटर टेस्टिंग किट, मॉनिटरिंग के अभाव में चार साल से पड़ी हैं बेकार
रतलाम में पीएचई विभाग द्वारा स्कूलों और आंगनवाड़ियों को दी जाने वाली वॉटर टेस्टिंग किट बिना इस्तेमाल के एक्सपायर हो रही हैं। मॉनिटरिंग के अभाव में हर साल हजारों किट बेकार हो रही हैं।
केंद्र और राज्य सरकारें विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के जरिए पेयजल, सड़क, स्वास्थ्य और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं पर पानी की तरह पैसा बहाती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर सही मॉनिटरिंग और प्रशासनिक इच्छाशक्ति के अभाव में यह सारा खर्च बेकार साबित होता है। ताजा मामला रतलाम जिले से सामने आया है जहाँ लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHE) द्वारा हर साल ग्रामीण इलाकों में शुद्ध पेयजल की जांच के लिए भारी मात्रा में फील्ड वॉटर टेस्टिंग किट वितरित की जाती हैं। विभाग ने जिले की सभी ग्राम पंचायतों, आंगनबाड़ी केंद्रों और शासकीय स्कूलों में पानी के स्रोतों की शुद्धता परखने के लिए ये किट पहुंचाई थीं, लेकिन देखरेख और विभागीय उदासीनता के चलते यह महत्वपूर्ण किटें बिना एक बार भी इस्तेमाल हुए कबाड़ बन रही हैं और एक्सपायर हो चुकी हैं।
📊 हर साल रतलाम में बर्बाद होती हैं करीब 3,000 किटें, आंगनवाड़ियों और स्कूलों में नहीं हो रहा उपयोग
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक रतलाम जिले में कुल 418 ग्राम पंचायतें, 1100 शासकीय स्कूल और 2000 आंगनबाड़ी केंद्र संचालित हैं, जहाँ हर साल लगभग 3,000 फील्ड वॉटर टेस्टिंग किट भेजी जाती हैं। इन किटों के अंदर पानी की जांच के लिए जरूरी केमिकल, विभिन्न उपकरण, यूजर मैन्युअल और फीडबैक बुक शामिल होती है। सेमलिया ग्राम पंचायत के सरपंच विशाल चौहान ने इस व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए बताया कि पीएचई विभाग के कर्मचारी हर साल किट तो थमा जाते हैं, लेकिन कभी उसका डेटा या फीडबैक लेने वापस नहीं आते। वहीं, एक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उन्हें विभागीय कार्यों के अलावा जनगणना और स्वास्थ्य योजनाओं जैसे कई अन्य काम दे दिए जाते हैं, ऐसे में यह टेस्टिंग किट पिछले तीन-चार सालों से बिना खुले वैसी ही धूल खा रही है।
🔬 पीएचई विभाग का पक्ष: शिकायत मिलने पर लैब में कराते हैं टेस्ट
इस पूरे मामले पर जब लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHE) के ईई एसआर जांगड़े से बात की गई, तो उन्होंने सफाई देते हुए कहा कि फील्ड वॉटर टेस्टिंग किट का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण इलाकों में पेयजल स्रोतों की समय-समय पर जांच करना है, खासकर बरसात के मौसम में जब पानी के दूषित होने का खतरा सबसे ज्यादा रहता है। विभाग का दावा है कि किट के जरिए जब पंचायतों या स्कूलों से रिपोर्ट मिलती है, तो टीम मौके पर जाकर सैंपल को लैब में टेस्ट करती है और आवश्यक उपचार करती है। बहरहाल, विभाग भले ही इन किटों के नियमित इस्तेमाल का दावा कर रहा हो, लेकिन धरातल पर पंचायत भवनों और आंगनबाड़ी केंद्रों में एक्सपायर हो चुकी यह किटें सरकारी तंत्र की पोल खोलने के लिए काफी हैं।
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