मायानगरी को बसाने में पारसियों का ऐतिहासिक योगदान, जानिए मुंबई की खूबसूरत इमारतों के पीछे की कहानी
मुंबई के निर्माण में पारसी समुदाय का अतुलनीय योगदान रहा है। टूरिस्ट गाइड जरु बरुचा ने शहर की ऐतिहासिक इमारतों, टाटा और जेजे कॉलेज के इतिहास पर प्रकाश डाला है।
जरु बरुचा की आवाज़ में मुंबई मायानगरी की चमक से बाहर निकलकर एक बेहद समृद्ध और पुराना इतिहास सामने आता है। जरु पर्यटकों का परिचय उस मुंबई से कराती हैं, जहां केवल अमिताभ बच्चन या फिल्म इंडस्ट्री का जिक्र नहीं होता, बल्कि वे सवाल करती हैं कि "मुंबई में इतना पैसा आया कहां से, बॉम्बई जिसे आज हम मुंबई कहते हैं, इसे बनाया किसने?" इसके बाद वे मुस्कुराते हुए बताती हैं कि जेएन पेटिट लाइब्रेरी, सर जेजे कॉलेज ऑफ आर्किटेक्चर, रीगल सिनेमा, टाटा मेमोरियल और कुसरो बाग जैसी तमाम ऐतिहासिक धरोहरों की हर लकीर पारसियों के योगदान से खींची गई है। गेटवे ऑफ इंडिया से शुरू होने वाले इस सफर में वे उन चेहरों को सामने लाती हैं जो इतिहास में उस तरह से चर्चित नहीं हो सके।
🏛️ साउथ मुंबई की हर ब्रिटिशकालीन इमारत में छिपी है पारसियों की मेहनत की दास्तान
गाइड जरु बताती हैं कि साउथ मुंबई की हर दूसरी सड़क पर खड़ी ब्रिटिशकालीन इमारतें पारसियों की मेहनत और लगन की कहानी बयां करती हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि पारसियों का इस शहर को खड़ा करने में जो विशाल योगदान रहा है, उसे विदेशी सैलानी तो बड़े चाव से जानना और सुनना चाहते हैं, लेकिन भारत के लोगों में इसको लेकर उतनी उत्सुकता नहीं दिखती। एक दौर था जब पारसियों ने सूरत और गुजरात के नवसारी से आकर इस समन्दर किनारे बसे शहर में कदम रखा था और अपना बिजनेस बढ़ाया था। आज भी मुंबई में ऐसे कई मकान और हाउसिंग सोसाइटियां हैं जो केवल 50 से 100 रुपए के बेहद कम भाड़े पर उपलब्ध हैं और जिनका पूरा खर्च ट्रस्ट द्वारा उठाया जाता है।
🎓 शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे में पारसी समुदाय का अतुलनीय और खुला योगदान
जरु सैलानियों को उस दौर की सैर कराती हैं जब सर कावरसी जहांगीर ने एल्फिंस्टन कॉलेज की स्थापना की थी, जिससे वे खुद पासआउट हैं। टाटा परिवार ने आईएनएस से लेकर ताजमहल होटल और हेल्थ सेक्टर में टाटा मेमोरियल अस्पताल तक देश को क्या कुछ नहीं दिया, और देश की पहली एयरलाइन 'एयर इंडिया' भी टाटा की ही देन है। इसके अलावा, जेजे कॉलेज ऑफ आर्किटेक्चर जमशेदजी जीजी भाई के भारी डोनेशन से तैयार हुआ था। सिनेमा के क्षेत्र में पहला रीगल सिनेमा फ्रामजी सिधवा ने बनवा कर दिया था और 1930 में जेरबाई वाडिया द्वारा तैयार किया गया कुसरो बाग आज भी शान से खड़ा है। आज भले ही मुंबई के दादर और अन्य इलाकों में पारसी आबादी सिमटकर कुछ हजार रह गई हो, लेकिन इस शहर की नींव में उन्हीं का पसीना शामिल है।
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