भारत छोड़कर नहीं भाग रहे विदेशी निवेशक! 2.8 लाख करोड़ बेचने के बाद IPO में लगाए ₹47,000 करोड़

विदेशी निवेशकों (FIIs) ने भारतीय शेयर बाजार में 2.8 लाख करोड़ रुपये की बिकवाली के साथ IPO में 47,000 करोड़ का बड़ा निवेश किया है। जानें क्या है FIIs का नया इन्वेस्टमेंट पैटर्न।

Sep 11, 2026 - 18:47
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भारत छोड़कर नहीं भाग रहे विदेशी निवेशक! 2.8 लाख करोड़ बेचने के बाद IPO में लगाए ₹47,000 करोड़

भारतीय शेयर बाजार से विदेशी निवेशक (FIIs) लगातार अपना पैसा निकाल रहे हैं। आंकड़ों के अनुसार, इस साल अब तक उन्होंने करीब 2.8 लाख करोड़ रुपये के शेयर बेच दिए हैं। बाजार में हो रही इस भारी बिकवाली को देखकर आम रिटेल निवेशकों को लग सकता है कि विदेशी फंड भारत से बाहर जा रहे हैं। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू बेहद दिलचस्प है। एक तरफ जहां ये पुरानी लिस्टेड कंपनियों के शेयर बेच रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ आईपीओ (IPO) के जरिए प्राइमरी मार्केट में इन्होंने 47,000 करोड़ रुपये का भारी-भरकम निवेश किया है। यानी उनका पैसा देश से बाहर नहीं जा रहा, बल्कि केवल निवेश की रणनीति और तरीका बदला है।

सैमको सिक्योरिटीज के इक्विटी रिसर्च एनालिस्ट राज गायकर का कहना है कि विदेशी संस्थागत निवेशक भारत से पूरी तरह बाहर नहीं निकल रहे हैं, वे केवल अपना एसेट एलोकेशन पैटर्न बदल रहे हैं। यह ट्रेंड नया नहीं है; इससे पहले 2024 में एफआईआई ने 1.21 लाख करोड़ रुपये के आईपीओ खरीदे थे, जबकि 2025 में 74,000 करोड़ रुपये प्राइमरी मार्केट में लगाए थे।

📉 पुरानी लिस्टेड कंपनियों से क्यों घटा विदेशी निवेशकों का भरोसा?

विदेशी निवेशकों को अब भारतीय बाजार की पुरानी लिस्टेड कंपनियों के शेयर वैल्यूएशन के लिहाज से काफी महंगे लग रहे हैं। इसके साथ ही कई बड़ी कंपनियों की वित्तीय कमाई (Earnings Growth) की रफ्तार भी धीमी पड़ी है। ऐसे में विदेशी फंड्स अब अन्य उभरते बाजारों में बेहतर अवसर तलाश रहे हैं और भारत में अपनी पुरानी होल्डिंग लगातार घटा रहे हैं।

विशेष रूप से वित्तीय सेवाओं (Financial Services), ऑटोमोबाइल, तेल और गैस जैसे पारंपरिक क्षेत्रों की कंपनियों के शेयर सबसे ज्यादा बेचे गए हैं। अकेले जनवरी से अगस्त 2026 के बीच फाइनेंशियल सेक्टर से 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक की शुद्ध निकासी दर्ज की गई है।

🎯 एंकर कोटा और तय कीमतें: आईपीओ (IPO) में निवेश करना क्यों पसंद कर रहे FIIs?

प्राइमरी मार्केट यानी आईपीओ में निवेश करना विदेशी फंड्स के लिए काफी सुविधाजनक होता है। एंकर कोटे (Anchor Quota) के जरिए वे एक ही बार में बड़ी संख्या में शेयर बिना किसी बड़े प्राइस स्लिपेज के खरीद लेते हैं। यदि वे ओपन मार्केट (सेकेंडरी मार्केट) से इतनी ही बड़ी मात्रा में शेयर खरीदने की कोशिश करेंगे, तो शेयर की कीमतें अचानक बहुत तेजी से उछल जाएंगी, जिससे उनकी औसतन खरीद काफी महंगी हो जाएगी।

आनंद राठी शेयर्स की एसोसिएट डायरेक्टर तन्वी कंचन बताती हैं कि प्राइमरी मार्केट में बड़ी संस्थागत कंपनियों को तय वैल्यूएशन पर शेयर मिल जाते हैं और उस समय बाजार के दैनिक उतार-चढ़ाव का सीधा असर उनकी खरीद लागत पर नहीं पड़ता।

🚀 इलेक्ट्रॉनिक्स, रिन्यूएबल और कंज्यूमर टेक जैसे नए सेक्टर्स पर FIIs की टिकीं नजरें

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) के पोर्टफोलियो में अब एक बड़ा संरचनात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है। बैंकिंग और आईटी (IT) जैसे स्थापित बिजनेस में अब पहले जैसी तेज ग्रोथ नहीं दिख रही है। इसलिए निवेशक अब इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग, कंज्यूमर टेक, रिन्यूएबल एनर्जी और न्यू-एज टेक्नोलॉजी जैसे उभरते सेक्टर्स की तरफ रुख कर रहे हैं। बाजार में इन सेक्टर्स से जुड़ी कई नई कंपनियां आ रही हैं और इनमें सीधे हिस्सेदारी लेने का सबसे पारदर्शी और आसान जरिया आईपीओ ही है।

🏢 4.7 लाख करोड़ रुपये के आईपीओ कतार में, घरेलू निवेशकों के मजबूत सपोर्ट से बाजार को सहारा

भारत में आईपीओ मार्केट इस वक्त अपने चरम पर है। बाजार नियामक सेबी (SEBI) के पास करीब 4.7 लाख करोड़ रुपये के आईपीओ ड्राफ्ट की कतार लगी हुई है। आने वाले समय में जियो प्लेटफॉर्म्स, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE), और फोनपे जैसी कई दिग्गज कंपनियों के मेगा आईपीओ बाजार में दस्तक दे सकते हैं। इससे विदेशी निवेशकों का उत्साह लगातार बना हुआ है।

हालांकि, इस पूरे आईपीओ बूम के पीछे केवल विदेशी निवेशक ही नहीं हैं। भारत के घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) और म्यूचुअल फंड्स ने भी बाजार में भारी तरलता (Liquidity) बनाए रखी है, जिससे भारतीय बाजार विदेशी बिकवाली के बावजूद मजबूती से टिका हुआ है।

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