भारत में धान के खेतों से हर साल निकल रही 97 लाख टन मीथेन, IISER भोपाल की स्टडी में खुलासा
IISER भोपाल और IRRI की रिसर्च में खुलासा हुआ है कि भारत के धान के खेतों से हर साल 97 लाख टन मीथेन वातावरण में पहुंचती है, जिसमें 74.7% हिस्सा खरीफ फसल का है। पूरी खबर पढ़ें।
भोपाल। भारत दुनिया के सबसे बड़े चावल उत्पादक देशों में से एक है, लेकिन इसकी खेती पर्यावरण और जलवायु पर भी बड़ा प्रभाव डाल रही है। आईआईएसईआर भोपाल (IISER) और अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (IRRI) के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक नए शोध में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। रिसर्च के मुताबिक, भारत में धान के खेतों से हर साल औसतन 9.73 मिलियन टन (लगभग 97 लाख टन) मीथेन गैस वातावरण में घुल रही है। यह मात्रा पूर्व में लगाए गए विभिन्न अनुमानों से कहीं अधिक है। अध्ययन में यह भी स्पष्ट हुआ कि कुल मीथेन उत्सर्जन का लगभग 74.7 प्रतिशत हिस्सा मानसून में बोई जाने वाली खरीफ (धान) की फसल से आता है।
🛰️ उपग्रह आंकड़ों और वैज्ञानिक मॉडल से 2018 से 2025 तक का किया गया बारीक आकलन
वैज्ञानिकों ने विदेशी उपग्रह आंकड़ों का उपयोग करते हुए पूरे देश में धान की खेती का एक विस्तृत और सटीक नक्शा तैयार किया। इसमें दो अलग-अलग उपग्रहों से प्राप्त डेटा को एडवांस वैज्ञानिक मॉडल के साथ एकीकृत किया गया। इसके माध्यम से वर्ष 2018 से 2025 के दौरान भारत में धान की फसल से होने वाले मीथेन उत्सर्जन का मौसम और क्षेत्रीय स्तर पर सटीक आकलन तैयार किया गया। इस अध्ययन में धान के क्षेत्रफल की पहचान करने में 90.12 प्रतिशत की उच्च सटीकता दर्ज की गई।
🌧️ खरीफ सीजन में धान की फसल बनी मीथेन का सबसे बड़ा स्रोत
शोध के आंकड़ों के अनुसार, भारत में धान की खेती से उत्पन्न होने वाली मीथेन का सबसे बड़ा भाग खरीफ सीजन से आता है। देश के कुल सालाना उत्सर्जन में 74.7 प्रतिशत योगदान खरीफ फसल का, 17.5 प्रतिशत योगदान जायद (गर्मी के मौसम) का और 7.8 प्रतिशत योगदान रबी मौसम की फसल का है। इससे स्पष्ट होता है कि मानसून के दौरान खेतों में लगातार पानी भरा रहने से बनने वाली परिस्थितियां मीथेन गैस के उत्पादन को तेजी से बढ़ाती हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि खरीफ सीजन में सुव्यवस्थित जल प्रबंधन अपनाकर इस उत्सर्जन में बड़ी कमी लाई जा सकती है।
💧 पानी से लबालब भरे खेतों में कैसे बनती है हानिकारक मीथेन गैस?
रिसर्च टीम की प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. धन्यालक्ष्मी पिल्लई के अनुसार, धान के खेतों में लंबे समय तक पानी ठहरा रहने से मिट्टी के भीतर ऑक्सीजन की भारी कमी हो जाती है। ऐसी अवायवीय (Anaerobic) परिस्थितियों में जैविक पदार्थों के सड़ने व अपघटन की प्रक्रिया के दौरान मीथेन उत्पन्न करने वाले सूक्ष्मजीव अत्यधिक सक्रिय हो जाते हैं। निर्मित मीथेन गैस का बड़ा हिस्सा धान के पौधों की तनों व नलिकाओं के माध्यम से वातावरण में उत्सर्जित होता है। यही कारण है कि खेतों में सिंचाई और जल ठहराव का तरीका सीधे तौर पर मीथेन उत्सर्जन की मात्रा को तय करता है।
🚜 वैज्ञानिकों का सुझाव: बेहतर जल प्रबंधन से पैदावार घटाए बिना कम होगा उत्सर्जन
डॉ. धन्यालक्ष्मी पिल्लई ने बताया, "चूंकि खरीफ सीजन अकेले देश के धान संबंधी मीथेन उत्सर्जन का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा पैदा करता है, इसलिए कार्बन उत्सर्जन घटाने के लिए सबसे पहले इसी मौसम में जल प्रबंधन तकनीकों पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है। भारत में कृषि क्षेत्र से होने वाले मीथेन उत्सर्जन के मौजूदा अनुमानों में अब तक काफी अनिश्चितता बनी हुई थी। इस नए अध्ययन ने पहली बार उपग्रह से प्राप्त वास्तविक क्षेत्रीय डेटा और वैज्ञानिक मॉडल को जोड़कर पूरे देश का सबसे सटीक आकलन प्रस्तुत किया है।" वैज्ञानिकों का कहना है कि ये आंकड़े उन विशेष राज्यों और क्षेत्रों की पहचान करने में मददगार साबित होंगे, जहां धान की कुल पैदावार को प्रभावित किए बिना जल प्रबंधन में तकनीकी बदलाव लाकर मीथेन उत्सर्जन को नियंत्रित किया जा सके।
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