विकसित भारत 2047 के लिए महिलाओं के 'अदृश्य श्रम' को पहचानना जरूरी; सागर यूनिवर्सिटी का शोध

सागर यूनिवर्सिटी की डॉ. शिवानी मीणा के शोध के अनुसार, महिलाओं के अवैतनिक घरेलू श्रम को पहचानकर ही 'विकसित भारत 2047' का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।

Sep 17, 2026 - 18:23
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विकसित भारत 2047 के लिए महिलाओं के 'अदृश्य श्रम' को पहचानना जरूरी; सागर यूनिवर्सिटी का शोध

सागर। भारत में हर सुबह एक ऐसी स्थिति से शुरू होती है, जिसमें देश की आधी आबादी सूरज उगने से पहले ही घर के रोजमर्रा के सभी काम निपटा चुकी होती है। जब स्कूल, दफ्तर और कारखाने शुरू भी नहीं होते, तब घर की महिलाएं साफ-सफाई, खाना बनाने से लेकर बच्चों व बुजुर्गों की देखभाल का जिम्मा संभाल चुकी होती हैं। ये ऐसे बुनियादी काम हैं, जिनके बिना किसी परिवार और समाज के दिन की कल्पना नहीं की जा सकती। हालांकि, देश के पारंपरिक आर्थिक मापदंडों (GDP) में महिलाओं के इस विशाल योगदान को गिना ही नहीं जाता है।

🏛️ विकसित भारत 2047 के लिए महिलाओं के कामों का मूल्यांकन जरूरी: डॉ. शिवानी मीणा का बड़ा सवाल

यह भारत की एक ऐसी 'अदृश्य कार्यशक्ति' है, जिसे पहचानना 'विकसित भारत 2047' का सपना साकार करने के लिए बेहद जरूरी है।

डॉ. हरि सिंह गौर विश्वविद्यालय (सागर यूनिवर्सिटी) के सामान्य एवं व्यावहारिक भूगोल विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. शिवानी मीणा ने अपने एक विस्तृत अध्ययन के जरिए इस गंभीर विषय को रेखांकित किया है। उन्होंने सवाल उठाया है कि क्या हम महिलाओं के इस जमीनी और अवैतनिक योगदान को बिना महत्व दिए 'विकसित भारत 2047' की परिकल्पना पूरी कर सकते हैं?

📊 घरेलू कामकाज और देखभाल में भारी लैंगिक अंतर: गुजरात, हरियाणा और महाराष्ट्र में बोझ अधिक

डॉ. शिवानी मीणा के अध्ययन के अनुसार, भारत में पुरुषों की तुलना में महिलाओं की अवैतनिक घरेलू कामों में भागीदारी बहुत अधिक है, लेकिन राज्यों के स्तर पर इसके आंकड़े अलग-अलग हैं।

खाना पकाने, साफ-सफाई और पानी लाने जैसे कामों में गुजरात, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में यह लैंगिक अंतर काफी ज्यादा है। वहीं, पूर्वोत्तर के छोटे राज्यों जैसे सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड में यह अंतर तुलनात्मक रूप से कम है। इसके अलावा बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल में लक्षद्वीप, जम्मू-कश्मीर, पश्चिम बंगाल, मेघालय और उत्तर प्रदेश में महिलाओं पर बोझ अधिक पाया गया है।

🏙️ ग्रामीण और शहरी भारत में असमानता: शहरों में भी कम नहीं हो रहीं महिलाओं की जिम्मेदारियां

अदृश्य श्रम के मामले में ग्रामीण और शहरी इलाकों के बीच का अंतर भी काफी अहम है।

मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और मिजोरम जैसे राज्यों के ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं की भागीदारी अन्य राज्यों की तुलना में काफी अधिक है। दूसरी तरफ, अध्ययन से यह बात भी सामने आई है कि बढ़ता शहरीकरण भी महिलाओं का घरेलू बोझ कम नहीं कर पा रहा है। तमिलनाडु, कर्नाटक, दिल्ली और पश्चिम बंगाल के शहरी क्षेत्रों में भी महिलाओं की घरेलू जिम्मेदारियां काफी ज्यादा बनी हुई हैं।

⚖️ 'कंपोजिट अनपेड वर्क बर्डेन इंडेक्स' (UWBI): महिलाओं के पास समय और आजादी का अभाव

अध्ययन में विकसित किया गया 'कंपोजिट अनपेड वर्क बर्डेन इंडेक्स' (UWBI) इस लैंगिक असमानता को पूरी तरह उजागर करता है।

आंध्र प्रदेश, गुजरात, जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र और हरियाणा में UWBI का आंकड़ा 3 से अधिक रहा है, जो अत्यधिक बोझ को दर्शाता है। डॉ. मीणा के मुताबिक, समस्या केवल यह नहीं है कि महिलाएं बिना वेतन के काम करती हैं, बल्कि मुख्य मुद्दा यह है कि इस काम के कारण उनके पास कौशल विकास (Skill Development), रोजगार, उद्यमिता या सार्वजनिक जीवन में आगे बढ़ने के लिए समय ही नहीं बचता।

🗺️ भौगोलिक आधार पर बनानी होगी राष्ट्रीय रणनीति: हर राज्य के लिए एक समान नीति कारगर नहीं

अध्ययन में यह भी देखा गया है कि अवैतनिक काम और महिला श्रमबल भागीदारी (FLFP) का संबंध पूरे देश में एक समान नहीं है।

राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में यह संबंध कमजोर दिखता है, जबकि झारखंड, ओडिशा, बिहार और पूर्वोत्तर राज्यों में यह काफी मजबूत है। इससे स्पष्ट होता है कि पूरे देश में एक ही तरह की राष्ट्रीय नीति लागू करने से समान परिणाम नहीं मिलेंगे, बल्कि क्षेत्र-विशेष की जरूरतों के अनुसार रणनीतियां तय करनी होंगी।

🧒 देखभाल सहायता और बुनियादी सुविधाओं में निवेश: 'विकसित भारत 2047' का असली रास्ता

विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को पाने के लिए लैंगिक संवेदनशीलता के साथ-साथ भौगोलिक संवेदनशीलता भी जरूरी है।

जिन क्षेत्रों में महिलाओं पर घरेलू काम का बोझ ज्यादा है, वहां बच्चों व बुजुर्गों के लिए केयर-सेंटर, जल, ऊर्जा और स्वच्छता जैसी बुनियादी सुविधाओं में सरकारी निवेश बढ़ाना होगा। जहां परिवार की जिम्मेदारियां महिलाओं को नौकरी करने से रोकती हैं, वहां रोजगार योजनाओं के साथ सामाजिक देखभाल सहायता जोड़ना आवश्यक है। UWBI जैसे सूचकांकों के जरिए ऐसे प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान की जा सकती है।

💡 केवल रोजगार नहीं, समय की आजादी से सशक्त होगी नारी शक्ति: आर्थिक प्रगति के लिए नए दृष्टिकोण की आवश्यकता

'विकसित भारत 2047' की कल्पना केवल गगनचुंबी इमारतों, एक्सप्रेस-वे, नई तकनीकों और बड़े उद्योगों तक सीमित नहीं होनी चाहिए।

वास्तविक विकसित भारत वह होगा जहां हर महिला के पास सीखने, कमाने, नवाचार करने और नेतृत्व करने के लिए पर्याप्त समय और आजादी होगी। महिलाओं का अवैतनिक श्रम देश के अर्थशास्त्र को मजबूती देता है; इसलिए इसे पहचानना केवल सामाजिक न्याय का मुद्दा नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक प्रगति के लिए अनिवार्य आवश्यकता है।

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