Sagar News: राष्ट्रपति भवन में बेटे ने ग्रहण किया पिता का पद्मश्री; बुंदेली कला को विश्व पटल पर लाने वाले दाऊ भगवानदास का सफर

बुंदेली मार्शल आर्ट के जनक दाऊ भगवानदास रैकवार को मरणोपरांत पद्मश्री से सम्मानित किया गया। राष्ट्रपति भवन में उनके पुत्र राजकुमार रैकवार ने सम्मान ग्रहण किया।

Jun 24, 2026 - 14:30
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Sagar News: राष्ट्रपति भवन में बेटे ने ग्रहण किया पिता का पद्मश्री; बुंदेली कला को विश्व पटल पर लाने वाले दाऊ भगवानदास का सफर

सागर। बुंदेली मार्शल आर्ट को न केवल जीवंत रखा, बल्कि उसे वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाने वाले 'दाऊ' भगवानदास रैकवार अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी विरासत आज भी जीवित है। उनकी जीवन भर की तपस्या और सेवाभाव को सम्मान देते हुए भारत सरकार ने उन्हें 2026 में 'अनसंग हीरो' कैटेगरी में पद्मश्री सम्मान से नवाजा। राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में उनके पुत्र राजकुमार रैकवार ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के हाथों यह गरिमामयी सम्मान ग्रहण किया।

⚔️ अखाड़े से पद्मश्री तक का सफर

दाऊ भगवानदास रैकवार (जन्म: 2 जनवरी 1944) का पूरा जीवन बुंदेली अखाड़ा शैली को समर्पित रहा। वे बुंदेलखंड की प्रसिद्ध 'छत्रसाल व्यायामशाला' के उस्ताद थे। उन्होंने लाठी, भाला, ढाल, तलवार और त्रिशूल जैसी प्राचीन युद्धकलाओं को मंच पर प्रस्तुत करने योग्य कला में बदल दिया। अपनी विशिष्ट शैली के दम पर उन्होंने न केवल बुंदेलखंड बल्कि देश-दुनिया में बुंदेली मार्शल आर्ट का लोहा मनवाया। 82 वर्ष की आयु तक वे निरंतर इस कला के संरक्षण के लिए कार्य करते रहे।

🌟 "मेरी मेहनत रंग लाई"

जब गणतंत्र दिवस 2026 की पूर्व संध्या पर उन्हें पद्मश्री की घोषणा की गई, तब दाऊ ने गर्व के साथ कहा था, "मेरे जीवन की तपस्या और मेहनत रंग लाई है। भारत सरकार ने विलुप्त होती इस कला को प्रोत्साहन दिया है, जो पूरे बुंदेलखंड के लिए एक बड़ी उपलब्धि है।" दुर्भाग्यवश, लंबी बीमारी के चलते 19 अप्रैल 2026 को एम्स भोपाल में उनका निधन हो गया।

😢 भारी मन से बेटे ने ग्रहण किया सम्मान

राष्ट्रपति भवन में सम्मान ग्रहण करते समय उनके पुत्र राजकुमार रैकवार भावुक हो उठे। उन्होंने कहा, "यह क्षण मेरे लिए मिश्रित भावनाओं वाला था। एक तरफ पिता की मेहनत को राष्ट्रीय सम्मान मिलते देख अपार गर्व महसूस हो रहा था, तो दूसरी तरफ इस बात का गहरा दुख था कि काश पिताजी खुद अपने हाथों से राष्ट्रपति महोदया से यह गौरवशाली सम्मान प्राप्त करते।" दाऊ भगवानदास रैकवार की यह विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।

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