Ashura 2026: कर्बला की जंग से लेकर हालिया संघर्षों तक; ईरान में लाखों लोगों ने निकाला मातमी जुलूस
ईरान में मुहर्रम और आशूरा का मातम। लाखों लोगों ने सड़कों पर उतरकर इमाम हुसैन को दी श्रद्धांजलि। कर्बला की शहादत और हालिया युद्ध की यादों से भरा रहा माहौल।
ईरान में इस वर्ष मुहर्रम और आशूरा का पर्व अत्यंत भावुक और गंभीर माहौल में मनाया गया। देश भर में लाखों लोग काले वस्त्र धारण कर सड़कों पर उतरे और इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हुए मातम मनाया। इस वर्ष का मुहर्रम विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण रहा, क्योंकि यह हालिया तनावपूर्ण स्थितियों के बाद पहला मुहर्रम था। इस दौरान लोगों ने कर्बला के शहीदों के साथ-साथ हालिया घटनाओं में जान गंवाने वाले सर्वोच्च नेता अयातुल्ला सैयद अली खामेनेई, सैन्य अधिकारियों और हजारों आम नागरिकों को भी श्रद्धांजलि अर्पित की।
🕯️ शिया मुस्लिमों के लिए आशूरा की महत्ता
आशूरा का दिन 680 ईस्वी में हुई ऐतिहासिक 'कर्बला की जंग' का प्रतीक है। इसी दिन पैगंबर मोहम्मद साहब के नवासे, इमाम हुसैन ने अन्याय और अत्याचार के खिलाफ अपने 72 साथियों के साथ शहादत दी थी। उनके इस बलिदान को आज भी सत्य और न्याय के लिए खड़े रहने की सबसे बड़ी प्रेरणा माना जाता है। इस दौरान ईरान भर में जगह-जगह 'नज़री' (मुफ्त भोजन) का वितरण किया गया, जो इमाम हुसैन की मानवता और सेवा की सीख का प्रतीक है।
💠 तासुआ और हजरत अब्बास की याद
आशूरा से एक दिन पूर्व 'तासुआ' मनाया गया, जिसमें इमाम हुसैन के सौतेले भाई हजरत अब्बास की शहादत को नमन किया गया। हजरत अब्बास ने कर्बला में प्यासे बच्चों और महिलाओं तक पानी पहुँचाने के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे।
🌍 वैश्विक स्तर पर श्रद्धांजलि
केवल ईरान ही नहीं, बल्कि दुनिया भर से लाखों 'जायरीन' इराक के पवित्र शहर कर्बला पहुंचे, जहाँ इमाम हुसैन की दरगाह पर माथा टेककर अकीदत के फूल अर्पित किए गए। या हुसैन की गूंज और मातमी जुलूसों के माध्यम से पूरी दुनिया में शिया समुदाय ने इमाम हुसैन के संदेश 'अन्याय के खिलाफ लड़ाई' को दोहराया।
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