Chhatarpur News: छतरपुर की 250 साल पुरानी 'गंगा-जमुनी' परंपरा; हिंदू परिवार आज भी बना रहे ताजिए
छतरपुर में 250 साल से चली आ रही ताजिया बनाने की अनूठी परंपरा। हिंदू परिवार पीढ़ियों से निभा रहे हैं गंगा-जमुनी तहजीब का फर्ज।
छतरपुर। छतरपुर में ताजिया निकालने की परंपरा न केवल धार्मिक है, बल्कि यह सांप्रदायिक सौहार्द की एक जीवंत मिसाल भी है। 1765 में महाराजा प्रताप सिंह के शासनकाल में शुरू हुई यह परंपरा आज लगभग 250 साल बाद भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है। हैरानी की बात यह है कि शहर के मुख्य और सबसे बड़े ताजिए को बनाने का कार्य हिंदू परिवार पीढ़ियों से करते आ रहे हैं।
🎨 दो महीने पहले से शुरू होती है बारीकियां
गल्ला मंडी निवासी नत्थू भदौरिया बताते हैं कि यह उनके परिवार की छठी पीढ़ी है जो ताजिया निर्माण का कार्य कर रही है। हिंदू और मुस्लिम समाज के लोग मिलकर बांस की खपच्चियों, रंगीन कागज और कपड़े से आकर्षक ताजिया व बुर्राख तैयार करते हैं। मोहर्रम से करीब दो महीने पहले से ही शुरू होने वाला यह निर्माण कार्य समर्पण और अकीदत का प्रतीक है। नत्थू भदौरिया के अनुसार, ताजिया बनाने की शुरुआत सबसे पहले हिंदू परिवार के सदस्य ही करते हैं।
🕌 रियासत कालीन विरासत: गल्ला मंडी का ताजिया सबसे प्रमुख
छतरपुर के विभिन्न मोहल्लों जैसे टोरिया, नट मोहल्ला, रानी तालिया से गुजरते हुए ताजिए अंततः चौक बाजार और महलों की ओर आते हैं। इनमें 'गल्ला मंडी इमाम बाड़ा' का ताजिया सबसे बड़ा और प्रमुख माना जाता है। स्थानीय बुजुर्ग बाबूलाल नामदेव, जो पिछले 85 सालों से इस परंपरा में शामिल हो रहे हैं, बताते हैं कि इमामबाड़े पर हर धर्म के लोग अपनी मुरादें लेकर आते हैं और यहां कोई भेदभाव नहीं होता।
🌙 गम और अकीदत के साथ निकला जुलूस
मोहर्रम की नवमीं पर पूरा शहर इमाम हुसैन की याद में गमगीन दिखाई दिया। देर रात तक अकीदतमंदों की भीड़ ताजिए की जियारत के लिए उमड़ी रही। जुलूस के दौरान अलाव खेलने की रस्म भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई गई। सुरक्षा के मद्देनजर सीएसपी अरुण सोनी ने बताया कि छतरपुर पुलिस प्रशासन द्वारा पुख्ता इंतजाम किए गए हैं और संवेदनशील मार्गों पर भारी पुलिस बल तैनात किया गया है। शुक्रवार को धार्मिक रस्मों के बाद इन ताजियों को कर्बला में सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा।
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