जबलपुर संभाग में खाद संकट: ई-टोकन सिस्टम के दावों के बीच किसान परेशान, नहीं मिल रही समय पर खाद
जबलपुर संभाग में ई-टोकन प्रणाली के बाद भी खाद के लिए किसानों को करना पड़ रहा है संघर्ष। टोकन जनरेट होने के बाद भी खाद उपलब्ध नहीं।
जबलपुर। खरीफ सीजन की शुरुआत के साथ ही जबलपुर संभाग सहित समूचे महाकोशल क्षेत्र के किसान खाद की व्यवस्था को लेकर संकट में हैं। प्रदेश सरकार ने ई-टोकन व्यवस्था को पारदर्शी बताते हुए पर्याप्त खाद होने का दावा किया है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल 2026 से अब तक 11.66 लाख से अधिक ई-टोकन जारी किए जा चुके हैं और लगभग दो लाख टन उर्वरक वितरित किया गया है, फिर भी किसानों को खाद के लिए भटकना पड़ रहा है।
❌ टोकन के बाद भी खाद का इंतजार
जबलपुर, नरसिंहपुर, कटनी, सिवनी, छिंदवाड़ा, मंडला और डिंडौरी जिलों के किसानों की मुख्य शिकायत यह है कि ई-टोकन जनरेट होने और पोर्टल पर स्लॉट मिलने के बाद भी वितरण केंद्रों पर खाद उपलब्ध नहीं होती। किसानों को निर्धारित तिथि पर केंद्र पहुँचने के बावजूद खाली हाथ लौटना पड़ रहा है। यह स्थिति सरकार के उस दावे पर सवालिया निशान लगाती है जिसमें ई-टोकन को खाद वितरण में 'गेम चेंजर' बताया गया था।
🤔 व्यवस्था में कहाँ है खामी?
सरकार का मानना है कि इस नई प्रणाली से कतारें खत्म हुई हैं और कालाबाजारी पर रोक लगी है। इसके बावजूद, टोकन प्राप्त किसानों को खाद मिलने में विलंब क्यों हो रहा है, यह एक बड़ा सवाल है। किसानों की पीड़ा यह है कि यदि पर्याप्त भंडार मौजूद है, तो वितरण केंद्रों तक वह समय पर क्यों नहीं पहुँच रहा? क्या समस्या पोर्टल की तकनीकी खामी है, परिवहन की देरी है या वितरण केंद्रों का कुप्रबंधन?
📋 शासन और प्रशासन को देने होंगे इन सवालों के जवाब
प्रशासनिक दावों और खेत स्तर की वास्तविकता के बीच के इस अंतर को स्पष्ट करने के लिए निम्नलिखित सवालों के जवाब आवश्यक हैं:
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जबलपुर संभाग के सातों जिलों में डीएपी (DAP), यूरिया और एनपीके (NPK) का वास्तविक स्टॉक कितना है?
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कुल कितने किसानों के टोकन जनरेट हुए और कितनों को वास्तव में खाद प्राप्त हुई?
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क्या पोर्टल, परिवहन, गोदाम या वितरण केंद्र—किस स्तर पर बाधा आ रही है?
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क्या किसानों को तय समय पर खाद मिल रही है या उन्हें बार-बार चक्कर लगाने पड़ रहे हैं?
⚖️ व्यवस्था की पहली बड़ी परीक्षा
खरीफ सीजन से पहले ई-टोकन व्यवस्था की यह पहली बड़ी परीक्षा है। यदि प्रशासन जल्द ही इस वितरण प्रणाली की बाधाओं को दूर नहीं करता, तो महाकोशल के किसानों के लिए खेती करना मुश्किल हो सकता है। यह महज एक खाद संकट नहीं, बल्कि व्यवस्था की कार्यकुशलता की एक बड़ी चुनौती बन गया है।
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