टाटा संस के शेयरों पर मंडराया सवालिया निशान, नवल टाटा की 1989 की शर्त बनी विवाद की वजह
रतन टाटा की वसीयत में टाटा संस के 10,000 करोड़ के शेयरों को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। पिता नवल टाटा के 1989 के पुराने करार के कारण यह पेंच फंसा है।
उद्योग जगत के दिग्गज रतन टाटा के निधन के बाद उनकी विरासत और वसीयत को लेकर एक बड़ा कानूनी पेंच सामने आया है। टाटा संस के पूर्व चेयरमैन की वसीयत में दर्ज लगभग 10,000 करोड़ रुपये के शेयरों पर सवालिया निशान लग गया है। महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर के एक हालिया फैसले ने इस पूरे मामले को सुर्खियों में ला दिया है। इस पूरे विवाद की जड़ में रतन टाटा के पिता नवल टाटा द्वारा शेयरों को लेकर साल 1989 में किया गया एक पुराना करार है, जो अब चर्चा का विषय बन गया है।
📜 क्या है नवल टाटा की 1989 की शर्त, जिसके कारण फंसा शेयरों का मामला?
साल 1989 में नवाजबाई रतन टाटा ट्रस्ट (NRTT) ने नवल टाटा को कुछ शेयर ट्रांसफर किए थे। उस समय मशहूर कानूनविद् नानी पालखीवाला की सलाह पर यह शर्त लगाई गई थी कि नवल टाटा इन शेयरों को अपने जीवनकाल में किसी बाहरी व्यक्ति को नहीं दे सकते; यदि ट्रांसफर करना हो तो केवल अपनी पत्नी या बच्चों को ही कर सकते हैं। यही नियम उनके बच्चों पर भी लागू होना था ताकि टाटा संस के शेयर परिवार के पास ही सुरक्षित रहें। दिक्कत तब पैदा हुई जब रतन टाटा ने अपनी वसीयत में टाटा संस की 0.83 प्रतिशत हिस्सेदारी (कीमत 10,000 करोड़ से ज्यादा) दो चैरिटी संस्थाओं (RTET और RTEF) के नाम कर दी। चैरिटी कमिश्नर के अनुसार, यदि यह शर्तों का उल्लंघन है, तो ट्रस्टी उचित कदम उठा सकते हैं।
🤝 कोर्ट के बाहर मामले को सुलझाने की कोशिश, कानूनी विशेषज्ञों की अलग-अलग राय
इस जटिल विवाद को सुलझाने के लिए NRTT के ट्रस्टी (जिसमें नोएल टाटा, वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह शामिल हैं) अब रतन टाटा की वसीयत के एग्जीक्यूटर्स से बातचीत कर रहे हैं। इस मामले को कोर्ट में घसीटने के बजाय परिवार के भीतर ही आपसी सहमति से सुलझाने के प्रयास किए जा रहे हैं। वहीं, कानूनी जानकारों की राय इस पर बंटी हुई है; एक पक्ष का मानना है कि पिता की लगाई शर्तें वसीयत पर भी लागू होती हैं, जबकि दूसरी तरफ वसीयत तैयार करने वाले वकीलों का तर्क है कि शेयर चैरिटी के लिए दिए गए हैं, इसलिए यह पूरी तरह वैध है।
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