दशहरा से दिवाली के बीच मनाई जाती है आदिवासियों की खास बिरही पूजा, कद्दू-लौकी तोड़ने की है अनोखी परंपरा

शहडोल के आदिवासी अंचल की अनूठी परंपरा 'बिरही पूजा' के बारे में जानें। सुआ गीत, गौरा-गौरी उत्सव और व्रत के नियमों से जुड़ी पूरी रिपोर्ट पढ़ें।

Nov 07, 2026 - 13:48
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दशहरा से दिवाली के बीच मनाई जाती है आदिवासियों की खास बिरही पूजा, कद्दू-लौकी तोड़ने की है अनोखी परंपरा

शहडोल मध्य प्रदेश का एक प्रमुख आदिवासी बहुल जिला है, जहाँ आज भी कई ऐसी प्राचीन और समृद्ध आदिवासी परंपराएँ देखने को मिलती हैं जो बदलते वक्त के साथ धीरे-धीरे विलुप्ति की कगार पर पहुँच रही हैं। इन क्षेत्रों में आज भी दशहरा के बाद और दीपावली के ठीक पहले पारंपरिक आदिवासी सुआ गीत, लोक नृत्य और विशेष रूप से 'बिरही पूजा' की छटा देखने को मिलती है। बिरही पूजा एक ऐसी सामुदायिक पूजा है जो पूरे गाँव की खुशहाली और समृद्धि के लिए की जाती है। आदिवासी समाज के लोग पूरी निष्ठा और धार्मिक प्रवृत्ति के साथ हर साल इस परंपरा का निर्वहन करते हैं। हालांकि, पहले जहाँ एक ही गाँव में चार से पाँच अलग-अलग समूहों (ग्रुपों) में यह पूजा होती थी, वहीं अब बदलते दौर में मुश्किल से एक या दो ग्रुपों में ही यह सिमट कर रह गई है।

🎃 कैसे होती है बिरही पूजा की अनोखी शुरुआत? कद्दू-लौकी चोरी करने की अजीब और दिलचस्प परंपरा

पूजा की शुरुआत और विधि:

  • दशहरा और कद्दू-लौकी: शहडोल की इस अद्भुत परंपरा के बारे में स्थानीय निवासी संतलाल बैगा बताते हैं कि दशहरा के दिन घर की बेटियों द्वारा बिरही पूजा की शुरुआत की जाती है। इस रस्म के तहत वे किसी के भी घर से चुपचाप लौकी या कद्दू तोड़कर ले आती हैं और इसे लेकर कोई भी परिवार बुरा नहीं मानता, क्योंकि इसे शुभ रिवाज माना जाता है।

  • बुआई और गौरा-गौरी: लाई गई लौकी और कद्दू को बिरही बुवाई के लिए तय स्थान पर रखा जाता है। इसके तीन-चार दिन बाद वहाँ गड्ढा खोदकर बिरही की बुवाई की जाती है। बुवाई के ठीक 9 दिन बाद गौरा-गौरी की पूजा की जाती है, जिसके बाद उन्हें पूरे गाँव में घुमाने के पश्चात घर पर लाकर विधिवत पूजा संपन्न की जाती है।

👥 सामूहिक सहभागिता और बदलते वक्त का असर; 12 साल से कम उम्र के बच्चे भी होते हैं शामिल

पीढ़ीगत बदलाव और ग्रुप्स की स्थिति:

  • ग्रुप में होती है पूजा: आदिवासी समाज के लोग इस पूजा को सामूहिक रूप से करते हैं। जिस घर में पूजा की व्यवस्था होती है, वहाँ की बहू-बेटियाँ मिलकर अनुashthaan करती हैं।

  • बदलाव की बयार: मैकू बैगा बताते हैं कि इस पूजा में 12 साल से कम उम्र के लड़के भी शामिल होते हैं। बुआई के दिन और नौवें दिन पूजा के समय उपवास रखा जाता है। पहले जहाँ एक ही गाँव में कई ग्रुप यह पूजा करते थे, अब आधुनिकता के प्रभाव के कारण नए बच्चों में इसके प्रति रुझान कम होने से केवल एक-दो ग्रुप ही नजर आते हैं।

🕊️ गाँव का भ्रमण, मिट्टी के जीव-जंतुओं की थाली और धान के दानों का विशेष महत्व

प्रकृति प्रेम और लोक मान्यताएँ:

  • मिट्टी की कलाकृतियाँ: आदिवासियों की बिरही पूजा ग्रामीण एकता की मिसाल है। नौवें दिन जब मुख्य पूजा होती है, तो गौरा-गौरी के साथ-साथ तोता, जंगली तीतर और कछुआ जैसे जीव-जंतुओं और वन्यप्राणियों को मिट्टी से बनाकर थाली में सजाया जाता है। इसके ऊपर कलश रखकर और दीया जलाकर सिर पर धारण किया जाता है।

  • अन्न भंडार की समृद्धि: पूजा में इस्तेमाल होने वाले अनाज से निकालकर कुछ दाने लोग अपने घरों के मुख्य अनाज भंडार (कोठी) में मिला देते हैं। ग्रामीणों का अटूट विश्वास है कि ऐसा करने से घर में माता लक्ष्मी का आगमन होता है और साल भर अन्न का भंडार कभी खाली नहीं रहता। इस दौरान पूरे गाँव में सुआ गीतों की गूंज छाई रहती है।

📜 किस्से-कहानियों का दौर और व्रत तोड़ने के अनूठे नियम; 7 से 9 साल तक रखा जाता है उपवास

व्रत और लोक कथाओं की परंपरा:

  • किस्से-कहानियों की शुरुआत: संतलाल बैगा बताते हैं कि समाज में हर समय किस्से-कहानियाँ सुनने की अनुमति नहीं होती, लेकिन बिरही पूजा वाले दिन रात को जब गाँव का पंडा गाँव का भ्रमण कर घर लौटता है, तब से कहानियों का दौर शुरू होता है। इसी दिन से खलिहानों में धान की रखवाली करते हुए रात में किस्से-कहानियाँ सुनने-सुनाने की परंपरा शुरू होती है।

  • व्रत और समापन के नियम: बिरही पूजा का व्रत रखने वाले लोग लगातार 7 से लेकर 9 साल तक यह उपवास करते हैं। व्रत पूरा होने पर समापन के विशेष नियम होते हैं। व्रतधारी गौरा-गौरी, पूजा की थाल और कलश लेकर पूरे गाँव का भ्रमण करते हैं, जहाँ ग्रामीणों द्वारा उन्हें दाल, चावल और अन्य खाद्य सामग्रियाँ दान दी जाती हैं। अगली सुबह इसी सामग्री से भोजन तैयार कर व्रत का उद्यापन किया जाता है।

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