7 हजार करोड़ का पटाखा कारोबार लेकिन ग्लोबल मार्केट में हिस्सेदारी मात्र 0.042%: क्यों चीन से पीछे है भारत?
भारत का पटाखा उद्योग 7,000 करोड़ का है, लेकिन ग्लोबल एक्सपोर्ट में हिस्सेदारी मात्र 0.042% है। शिवकासी और चीन के मुकाबले से जुड़ी पूरी रिपोर्ट पढ़ें।
भारत में दिवाली आते ही पटाखों की मांग और बिक्री में भारी उछाल आ जाता है। देश में पटाखों का यह कारोबार लगभग 7,000 करोड़ रुपए का है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि इतना बड़ा और व्यापक उद्योग होने के बावजूद भारत वैश्विक (ग्लोबल) बाजार में अपनी मजबूत पकड़ नहीं बना पाया है। भारत से हर साल पटाखों का कुल निर्यात 10 लाख डॉलर से भी कम है, और ग्लोबल पटाखा एक्सपोर्ट मार्केट में भारत की हिस्सेदारी मात्र 0.042% है।
🏭 शिवकासी है देश में पटाखा उत्पादन का सबसे बड़ा केंद्र; 85 से 90 फीसदी हिस्सेदारी के साथ 30 दिनों में होती है 80% कमाई
उत्पादन और बाजार के आंकड़े:
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शिवकासी का योगदान: तमिलनाडु का शिवकासी शहर भारत में पटाखा उद्योग का सबसे बड़ा गढ़ है। देश के कुल पटाखा उत्पादन में अकेले इसी शहर की हिस्सेदारी लगभग 85 से 90 प्रतिशत है।
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कारोबार का दायरा: तमिलनाडु फायरवर्क्स एंड अमोर्सेस मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (TANFAMA) के अनुसार, देश का कुल पटाखा बाजार करीब 7,000 करोड़ रुपए का है। इसमें फैक्ट्री स्तर पर प्रोडक्शन का कारोबार लगभग 2,000 करोड़ रुपए है, जबकि बाकी रकम थोक व्यापार, परिवहन और खुदरा बिक्री से आती है। इस उद्योग की कुल वार्षिक कमाई का 80% से अधिक हिस्सा दीपावली के आसपास के सिर्फ 30 दिनों में आ जाता है। इसके अलावा केरल के विषु और महाराष्ट्र के गणेशोत्सव जैसे त्योहारों पर भी इनकी अच्छी मांग रहती है।
🌏 ग्लोबल बाजार में चीन का एकछत्र राज; लियुयांग शहर संभालता है दुनिया का 70% एक्सपोर्ट
चीन और भारत के निर्यात में अंतर:
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ड्रैगन का दबदबा: ग्लोबल पटाखा कारोबार पर पूरी तरह चीन का दबदबा है। UN Comtrade के आंकड़ों के मुताबिक, चीन हर साल करीब 1.1 अरब से 1.23 अरब डॉलर के पटाखों का निर्यात करता है, जबकि भारत का निर्यात महज 7.57 लाख डॉलर के आसपास सिमट कर रह जाता है।
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लियुयांग की भूमिका: चीन के हुनान प्रांत का लियुयांग शहर दुनिया भर में पटाखा उत्पादन का सबसे बड़ा केंद्र है। चीन के कुल उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी करीब 60% और ग्लोबल एक्सपोर्ट में लगभग 70% है। कम लागत, प्रचुर कच्चे माल, सरकारी सहयोग और मजबूत सप्लाई चेन नेटवर्क चीन को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में सबसे आगे रखते हैं।
⚠️ एक्सपोर्ट में क्यों आ रही है बड़ी परेशानियां? रेड कैटेगरी और कड़े नियमों की मार
भारतीय निर्माताओं के सामने चुनौतियाँ:
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खतरनाक विस्फोटक श्रेणी: पटाखों को अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत खतरनाक विस्फोटक सामान की श्रेणी में रखा जाता है। इसके कारण इनके परिवहन (ट्रांसपोर्टेशन), पैकेजिंग, बीमा और बंदरगाहों पर हैंडलिंग का खर्च बहुत ज्यादा बढ़ जाता है।
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रेड कैटेगरी का पेंच: तमिलनाडु में पटाखा उद्योग को 'रेड कैटेगरी' में रखा गया है, जबकि उद्योग लंबे समय से इसे कम जोखिम वाली श्रेणी में शामिल करने की माँग कर रहा है। इसके अलावा अलग-अलग राज्यों के नियम और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों का पालन करना छोटे कारोबारियों के लिए बेहद कठिन है।
🧪 केमिकल पर पाबंदियों का असर; बेरियम नाइट्रेट प्रतिबंध से फॉर्मूलेशन में आई दिक्कत
रासायनिक नियंत्रण और वैश्विक चुनौतियाँ:
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केमिकल बैन: पटाखा निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कुछ अहम केमिकल्स पर भारत में प्रतिबंध और कड़े नियंत्रण ने भी निर्यात को बुरी तरह प्रभावित किया है।
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सुप्रीम कोर्ट का आदेश: वर्ष 2018 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 'बेरियम नाइट्रेट' पर लगे प्रतिबंध के कारण भारतीय निर्माताओं के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार की माँग के अनुसार फॉर्मूलेशन तैयार करना कठिन हो गया है।
🚀 निर्यात बढ़ाने के लिए क्या उठाने होंगे कदम? आधुनिक तकनीक और साझा टेस्टिंग सेंटर की जरूरत
भविष्य की राह और संभावनाएं:
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तकनीक और सर्टिफिकेशन: विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को पटाखा उद्योग में आधुनिक तकनीक, बेहतर गुणवत्ता और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा सर्टिफिकेशन पर विशेष ध्यान देना होगा। शिवकासी में साझा टेस्टिंग सेंटर, उन्नत पैकेजिंग सुविधाएँ और आसान मंजूरियाँ विकसित करने की सख्त जरूरत है।
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वैश्विक बाजार में टक्कर: इसके साथ ही छोटे निर्माताओं को सीधे विदेशी खरीदारों और डिस्ट्रीब्यूटर्स से जोड़ना होगा। यदि भारत इन तकनीकी और प्रशासनिक चुनौतियों को पार कर ले, तो शिवकासी वैश्विक बाजार में चीन के लियुयांग को कड़ी टक्कर दे सकता है।
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