इंदौर की आंगनवाड़ियों में बड़ी लापरवाही; खीर-पुड़ी की जगह खिलाया सेंव-परमल, आयुक्त सख्त
इंदौर की आंगनवाड़ियों में हर तीसरा बच्चा कुपोषण और नाटेपन का शिकार है। महिला एवं बाल विकास आयुक्त निधि निवेदिता ने लापरवाही पर लगाई फटकार, जानें पूरा मामला।
इंदौर। इंदौर जिले में बच्चों के बीच कुपोषण की स्थिति इतनी अधिक गंभीर हो चुकी है कि हर तीन में से एक बच्चा नाटेपन (Stunting) का शिकार पाया गया है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मापदंडों के अनुसार, 5 वर्ष की उम्र के लड़कों की औसत लंबाई करीब 110 सेंटीमीटर और लड़कियों की 109.4 सेंटीमीटर होनी चाहिए, जबकि उनका वजन 15 से 17 किलोग्राम के बीच होना चाहिए. हालांकि, जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है. लालबाई-फूलबाई आंगनवाड़ी सिमरोल और भगोरा की आंगनवाड़ी क्रमांक 1, 2 व 3 में औचक निरीक्षण के दौरान एक भी बच्चा इस तय मापदंड पर खरा नहीं उतरा.
सरकारी 'पोषण ट्रैकर' (Poshan Tracker) ऐप के आंकड़ों के अनुसार, जिले में 0 से 5 वर्ष के कुल 1 लाख 36 हजार 202 पंजीकृत बच्चों में से 44 हजार 946 बच्चों की लंबाई उनकी उम्र के अनुसार सामान्य से काफी कम है. विशेषज्ञों का मानना है कि नाटापन बच्चों में लंबे समय तक पर्याप्त पोषण न मिलने और बार-बार होने वाले संक्रमण का सीधा संकेत होता है, जिसका असर बच्चे के पूरे जीवनकाल पर पड़ सकता है. दूसरी ओर, महिला एवं बाल विकास विभाग का दावा है कि उनके द्वारा आंगनवाड़ियों में बच्चों को नियमित रूप से 15-20 ग्राम प्रोटीन और 500 कैलोरी वाला संतुलित आहार दिया जा रहा है.
📊 2. क्या हैं विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के तय मापदंड?
बच्चों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को जांचने के लिए डब्लूएचओ (WHO) द्वारा निर्धारित की गई उम्र, लंबाई और वजन की मानक तालिका नीचे दी गई है:
| बच्चों की उम्र | मानक लंबाई (सेमी) | मानक वजन (किग्रा) |
| 2 वर्ष | 85 - 88 सेमी | 11.5 - 13 किग्रा |
| 3 वर्ष | 94 - 96 सेमी | 13.5 - 15 किग्रा |
| 4 वर्ष | 94 - 96 सेमी | 13.5 - 15 किग्रा |
| 5 वर्ष | 100 - 103 सेमी | 15 - 17 किग्रा |
🚫 3. खीर-पुड़ी की जगह खिलाया सेंव-परमल: आयुक्त निधि निवेदिता की बड़ी कार्रवाई
आंगनवाड़ियों में बच्चों के पोषण आहार को लेकर भारी लापरवाही भी उजागर हुई है. भगोरा पंचायत की आंगनवाड़ी में लगातार बच्चों को नियमानुसार मिलने वाली खीर-पुड़ी के स्थान पर सूखा सेंव-परमल परोसा जा रहा था. स्थानीय पंचायत ने इसकी शिकायत जनपद सीईओ (CEO) से भी की थी, लेकिन लंबे समय तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई.
इस गंभीर मामले का संज्ञान लेते हुए महिला एवं बाल विकास विभाग की आयुक्त निधि निवेदिता ने इंदौर की स्थानीय टीम को कड़ी फटकार लगाई है. विभाग ने तुरंत कार्रवाई करते हुए उमठ आंगनवाड़ी में भोजन सप्लाई करने वाले स्व-सहायता समूह को काम से हटा दिया है. साथ ही, व्यवस्था को पारदर्शी बनाने के लिए पूरी टीम को रोजाना फील्ड से भोजन वितरण की लाइव तस्वीरें (Photos) आधिकारिक ग्रुप पर अपलोड करने के सख्त निर्देश दिए हैं.
🍎 4. पंचायत ने उठाया बड़ा कदम: कुपोषण दूर करने के लिए खुद बांटेगी केला और गुड़-चना
प्रशासनिक हीलाहवाली के बीच भगोरा पंचायत ने बच्चों के स्वास्थ्य को सुधारने के लिए खुद एक सराहनीय पहल की है. गुरुवार को भगोरा पंचायत के सरपंच और सचिव ने संयुक्त रूप से क्षेत्र की 6 आंगनवाड़ियों का आकस्मिक निरीक्षण किया था, जहां जांच में 15 बच्चे अत्यधिक कुपोषित पाए गए. इसके बाद पंचायत ने यह ऐतिहासिक निर्णय लिया है कि वे अपनी ओर से पंचायत क्षेत्र की सभी आंगनवाड़ियों के बच्चों को नियमित रूप से केले और पौष्टिक गुड़-चना वितरित करेंगे ताकि बच्चों में कुपोषण के स्तर को कम किया जा सके.
🧠 5. जीवन के पहले दो साल होते हैं दिमागी विकास के लिए सबसे अहम
चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मत:
"0 से 5 वर्ष की उम्र किसी भी बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास की सबसे महत्वपूर्ण अवधि होती है. जन्म से लेकर शुरुआती दो वर्ष तक शिशु के मस्तिष्क का लगभग 80 से 90 प्रतिशत विकास हो जाता है. यदि इस अति-संवेदनशील अवधि के दौरान बच्चे को पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन, कैलोरी, आयरन और अन्य आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व (Micronutrients) नहीं मिलते हैं, तो उसकी सोचने-समझने, सीखने और याद रखने की क्षमता (Cognitive Abilities) हमेशा के लिए प्रभावित हो सकती है. लंबे समय तक पोषण की कमी रहने पर बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) कमजोर हो जाती है और शरीर में जरूरी हार्मोन्स व टिशू (Tissue) के निर्माण की प्रक्रिया बाधित होती है. इसका सीधा असर वयस्क होने पर उनकी कार्यक्षमता और कद-काठी पर दिखाई देता है."
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