'जान दांव पर क्यों?' इंदौर मेट्रो रूट पर भड़के लोग, मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने बुलाई आपात बैठक

इंदौर के मल्हारगंज में अंडरग्राउंड मेट्रो खुदाई से पुरानी इमारतों में तेज कंपन के बाद 400 परिवारों ने काम रुकवाया। मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने दिए समाधान निकालने के निर्देश।

Jul 18, 2026 - 15:56
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'जान दांव पर क्यों?' इंदौर मेट्रो रूट पर भड़के लोग, मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने बुलाई आपात बैठक

इंदौर। शहर के घनी आबादी और व्यस्ततम बाजार वाले मल्हारगंज इलाके में मेट्रो के अंडरग्राउंड रेलवे स्टेशन के निर्माण का जन सुरक्षा के लिहाज से भारी विरोध शुरू हो गया है. इंदौर के मल्हारगंज में जैसे ही अंडरग्राउंड मेट्रो के लिए टनल और स्टेशन की खुदाई का काम शुरू किया गया, वैसे ही आसपास की बहुमंजिला इमारतों में तेज कंपन (वाइब्रेशन) होने लगा. घरों और दुकानों के हिलने से घबराए सैकड़ों लोग अचानक सड़कों पर उतर आए. स्थानीय रहवासियों और व्यापारियों के भारी विरोध, हंगामे और धरने के बाद प्रशासन को तत्काल प्रभाव से खुदाई का काम रुकवाना पड़ा है. इस संवेदनशील मामले में मध्य प्रदेश के नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने संज्ञान लिया है. उन्होंने कहा कि, "प्रभावित लोगों ने अपनी जायज समस्याएं बताई हैं. इस मामले में आज ही मेट्रो ट्रेन के संबंधित शीर्ष अधिकारियों से चर्चा कर सुरक्षात्मक और व्यावहारिक हल निकाला जाएगा."

🏢 2. 400 परिवारों की जान दांव पर: 150 साल पुरानी लक्ष्मी बिल्डिंग की दीवारों में महसूस झटके

इंदौर मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन द्वारा किए गए रूट निर्धारण और घनी बस्तियों में स्टेशन बनाने की जिद के कारण जहां पहले ही इस परियोजना की उपयोगिता और भारी-भरकम बजट पर सवाल उठ रहे थे, वहीं अब जमीनी स्तर पर रहवासियों का भीषण आक्रोश झेलना पड़ रहा है.

पुरानी इमारतों को ढहने का खतरा:

दरअसल, मल्हारगंज क्षेत्र शहर का सबसे पुराना और व्यस्ततम कमर्शियल हब है. वर्तमान में जहां पर अंडरग्राउंड स्टेशन के लिए गहरी खुदाई चल रही है, वहां के आसपास की पुरानी इमारतें बुरी तरह हिल रही हैं. इस स्थिति में वे लोग भारी दहशत में हैं जो पिछले कई दशकों से इन 35 से 150 साल पुरानी इमारतों में रह रहे हैं. क्षेत्र के करीब 400 से अधिक परिवारों को आशंका है कि यदि भारी मशीनों की खुदाई के चलते ये जर्जर और पुरानी इमारतें ध्वस्त हो गईं, तो सैकड़ों लोगों की जान-माल का जिम्मेदार कौन होगा?

वरिष्ठ नागरिक शेखर गिरी ने बताया कि, "यहाँ स्थित ऐतिहासिक लक्ष्मी बिल्डिंग करीब 100-150 साल पुरानी है, जिसमें वर्तमान में 62 परिवार निवास कर रहे हैं. इसके अलावा बगल में स्थित महन कॉम्प्लेक्स भी 35 साल पुराना है. मेट्रो की मशीनों के चलने से इतना तेज वाइब्रेशन हुआ कि पूरी दीवारें और खिड़कियां हिल गईं. जब मेट्रो स्टेशन के लिए जमीन से कई फीट नीचे वर्टिकल खुदाई होगी, तो इन कमजोर ढांचों का क्या होगा? अगर यहाँ कोई बड़ी जनहानि हो गई तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?"

📋 3. सेंसर के भरोसे अधिकारी, लिखित आश्वासन पर अड़े रहवासी: सुरक्षा ऑडिट कराने की मांग

आक्रोशित रहवासी इसी बात को लेकर मेट्रो रेल प्रशासन से लिखित में सुरक्षा और मुआवजे का आश्वासन चाहते हैं. लेकिन मेट्रो रेल के तकनीकी अधिकारी कागजी तौर पर ऐसा कोई भी लिखित आश्वासन देने की स्थिति में नहीं हैं. यही वजह है कि निर्माण के दौरान घरों में लगातार तेज झटके महसूस होने के बाद मंगलवार को सैकड़ों महिलाएं, पुरुष और बच्चे सड़क पर धरने पर बैठ गए. इस दौरान जमकर नारेबाजी करते हुए लोगों ने मांग की कि खुदाई को आगे बढ़ाने से पहले आसपास के सभी निजी मकानों की व्यापक सुरक्षा जांच (Structural Safety Audit) कराई जाए और संभावित नुकसान का अग्रिम आकलन हो.

हालांकि, विरोध स्थल पर पहुंचे मेट्रो के तकनीकी अधिकारियों का तर्क था कि, "सुरक्षा के लिहाज से आधुनिक मशीनों में एडवांस सेंसर लगे हुए हैं, जिसके माध्यम से नियंत्रित कंपन (Controlled Vibration) का ही आकलन किया जा रहा है और खतरा सीमा से बाहर नहीं है." इसके बावजूद, अधिकारियों के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था कि यदि सेंसर के बाद भी ढांचा ढह गया तो क्या होगा. वे नागरिकों की मांग पर कुछ भी लिखित में देने से बचते नजर आए.

🗺️ 4. विकल्प के बावजूद घनी बस्ती में स्टेशन क्यों? मेट्रो रूट के चयन पर खड़े हुए बड़े सवाल
प्रभावित क्षेत्र और संपत्तियां वर्तमान संकट एवं रहवासियों की मांग
प्रभावित मुख्य इमारतें महन कॉम्प्लेक्स (35 साल पुराना), लक्ष्मी बिल्डिंग (150 साल पुरानी)
संकट में फंसे नागरिक 400 से ज्यादा परिवार (लगभग 500 से अधिक निवासी)
प्रशासनिक तर्क मशीनों में सेंसर मौजूद, कंपन पूरी तरह नियंत्रित
वैकल्पिक रूट का सुझाव सुभाष मार्ग (104 फुट चौड़ा सरकारी रोड, 2 बगीचे उपलब्ध)
मुख्य मांग काम तत्काल बंद हो, तकनीकी टीम से मकानों का सेफ्टी ऑडिट कराया जाए

रहवासियों का सबसे बड़ा तकनीकी सवाल मेट्रो के रूट डायवर्जन को लेकर है. आंदोलनकारियों का कहना है कि इसी लाइन के लिए पास में ही सुभाष मार्ग पर 104 फुट चौड़ा सरकारी रोड, दो बड़े बगीचे और सरकारी क्वार्टर मौजूद हैं, जहां कोई भी निजी संपत्ति नहीं है और न ही किसी के मकान को खतरा है. पूर्व में मेट्रो रूट को वहां शिफ्ट भी कर दिया गया था, फिर अचानक इस घनी बस्ती के संकरे बाजार में स्टेशन बनाने की जिद क्यों की जा रही है? क्या ठेकेदार और अधिकारियों के 15-20 करोड़ रुपये बचाने के लिए सैकड़ों लोगों की जान को दांव पर लगाया जाएगा?

🔇 5. परीक्षाओं के समय खुदाई के शोर से बच्चों की पढ़ाई ठप: जब तक सुरक्षा सुनिश्चित नहीं, आंदोलन रहेगा जारी

रहवासियों ने कंपन के साथ-साथ मेट्रो निर्माण के कारण दिन-रात होने वाले असहनीय शोर (Noise Pollution) और उड़ने वाली धूल-मिट्टी की भी गंभीर शिकायत की है. स्थानीय अभिभावकों का कहना है कि वर्तमान में बच्चों के परीक्षा के दिन चल रहे हैं, लेकिन सुबह-सुबह और देर रात तक होने वाली भीषण आवाजों के कारण बच्चे न तो पढ़ पा रहे हैं और न ही सो पा रहे हैं. रात 10 बजे के बाद भी भारी मशीनें चलती रहती हैं.

स्थानीय निवासियों ने इस संबंध में नगर निगम और मेट्रो प्रबंधन को कई बार लिखित शिकायतें भेजीं, लेकिन जब प्रशासनिक स्तर पर कोई सुनवाई नहीं हुई, तो उन्हें मजबूरन सड़कों पर उतरना पड़ा. धरने पर बैठे परिवारों ने साफ अल्टीमेटम दिया है कि जब तक हमारी जान-माल की मुकम्मल सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होती और विशेषज्ञ टीम द्वारा सुरक्षा ऑडिट नहीं हो जाता, तब तक यह आंदोलन और काम बंद की स्थिति लगातार जारी रहेगी. फिलहाल, इस बड़े जन-विरोध के चलते इंदौर मेट्रो के आला अधिकारियों की ओर से कोई भी आधिकारिक रक्षात्मक बयान सामने नहीं आया है.

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