छतरपुर के रंगमंच पर कलाकारों ने मनवाया अभिनय का लोहा, भारी बारिश के बीच गूंजे तीखे सामाजिक व्यंग्य
छतरपुर के गांधी आश्रम में 25 दिवसीय नाट्य कार्यशाला का शरद जोशी के नाटक 'एक था गधा उर्फ अलादाद खां' के मंचन के साथ समापन हुआ। भारी बारिश के बावजूद 30 कलाकारों की टीम ने दर्शकों को बांधे रखा।
छतरपुर। कला और संस्कृति की धनी नगरी छतरपुर में आयोजित 25 दिवसीय नाट्य व हास्य व्यंग्य समारोह का शानदार समापन हो गया. इस भव्य आयोजन के दौरान छतरपुर के नागरिकों को उत्कृष्ट कला का अनुभव करने और मनोरंजन का भरपूर अवसर मिला. संस्कृति विभाग, मध्य प्रदेश नाट्य विद्यालय (MPSD) और शंखनाद नाट्य मंच छतरपुर के संयुक्त तत्वावधान में गांधी आश्रम में चल रही लंबी नाट्य कार्यशाला का औपचारिक समापन हुआ. इस विदाई बेला को मशहूर व्यंग्यकार शरद जोशी द्वारा लिखित कालजयी नाटक "एक था गधा उर्फ अलादाद खां" के बेजोड़ मंचन ने हमेशा-हमेशा के लिए यादगार बना दिया.
छतरपुर के गांधी आश्रम के मुक्ताकाशी (ओपन एयर) मंच पर आयोजित इस नाटक के दौरान मौसम ने खलल डालने की कोशिश की, लेकिन भारी बारिश के बावजूद नाटक अविरल जारी रहा. पंडाल में बैठे दर्शकों ने भी अपनी जगह से बिना हिले कलाकारों का जमकर हौसला बढ़ाया. इस नाटक में 30 कलाकारों की एक विशाल टीम ने मंच पर अपने अभिनय का लोहा मनवाया. पिछले 25 दिनों से कार्यशाला में कठिन कड़ा प्रशिक्षण ले रहे स्थानीय अभ्यर्थियों ने सवा घंटे के इस नाटक में अपने सुरीले गीत-संगीत, सधे हुए संवाद (डायलॉग्स), शानदार वेशभूषा और जीवंत पात्र अभिनय से उपस्थित जनसमूह को अंत तक बांधे रखा.
इस सफल नाटक के पीछे मंच पर दिखने वाले अभिनेताओं के साथ-साथ बैकस्टेज (नेपथ्य) की टीम और मध्य प्रदेश नाट्य विद्यालय से आए वरिष्ठ प्रशिक्षकों की कड़ी मेहनत शामिल रही. कार्यशाला और नाटक के तकनीकी पक्षों का विवरण नीचे दी गई तालिका में देखा जा सकता है:
| विभाग / जिम्मेदारी | मुख्य विंग / प्रभारी नाम | कार्यशाला में योगदान |
| प्रमुख अभिनेता | राजेश कुशवाहा, अनिल कुशवाहा, अभि तिवारी, अभिषेक गोस्वामी, मानवेंद्र सिंह, स्वाति विश्वकर्मा, शिल्पा रैकवार, अवनी अहिरवार | सवा घंटे तक विभिन्न जटिल पात्रों का सजीव मंचन किया. |
| संगीत संयोजन | महेंद्र प्रताप तिवारी, मुकेश वर्मा, तन्मय सेन और राज राखेरिया | नाटक के व्यंग्य को सुरों और थिरकन से धार दी. |
| ध्वनि एवं प्रकाश (Lights & Sound) | अभिदीप सुहाने | मुक्ताकाशी मंच पर दृश्य के अनुसार सटीक माहौल बनाया. |
| कॉस्ट्यूम डिजाइन (वेशभूषा) | श्रुति चौरसिया, यश सोनी और नवदीप पाटकर | नवाबकालीन और आम जनता के दौर के परिधान तैयार किए. |
| रूपसज्जा व सह-निर्देशन | लक्ष्य अरोड़ा | कलाकारों के चरित्र के अनुसार उनका मेकअप तैयार किया. |
| मुख्य प्रशिक्षक (MPSD) | लक्ष्य अरोड़ा और गीता अहिरवार | 25 दिनों तक युवाओं को अभिनय व रंगमंच के सिद्धांत सिखाए. |
| कार्यशाला संयोजन व निर्देशन | शिवेन्द्र शुक्ला | पूरे 25 दिवसीय सत्र का सफल प्रबंधन और निर्देशन किया. |
शरद जोशी द्वारा लिखित यह नाटक सत्ता की चाटुकारिता, प्रशासनिक व्यवस्था की कमियों और राजनीतिक ढोंग पर एक तीखा प्रहार है. नाटक की कहानी जुग्गन नामक एक गरीब पात्र के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसका प्रिय गधा मर जाता है और वह दहाड़ें मारकर रोते हुए पूरे नगर में घूमता है. जुग्गन ने लाड-प्यार में अपने उस गधे का नाम 'अलादाद खां' रखा हुआ था.
नगर का नवाब एक बेहद सनकी और अपनी तारीफ का भूखा शख्स है. जब कोतवाल नवाब को आकर सूचना देता है कि शहर में 'अलादाद खां' की मृत्यु से मातम पसरा है, तो नवाब को गलतफहमी हो जाती है कि अलादाद खां कोई बहुत बड़ा और सम्मानित आदमी था. अपनी संवेदनशीलता का ढोंग रचने और जनता के बीच लोकप्रिय होने के लिए नवाब सार्वजनिक घोषणा कर देता है कि अलादाद खां के जनाजे को वह खुद अपने कंधों पर उठाएगा.
लेकिन जब बाद में नवाब को सच पता चलता है कि जिसे वह कंधा देने का वादा कर चुका है, वह कोई इंसान नहीं बल्कि एक गधा है, तो वह अपनी थू-थू होने के डर से बौखला जाता है और अपनी गलती छुपाने के लिए बेकसूर कोतवाल को फांसी पर चढ़ाने का हुक्म दे देता है. इस संकट की घड़ी में परेशान कोतवाल की मुलाकात अचानक एक दुकान पर सचमुच के 'अलादाद खां' नामक जीवित युवक से होती है. यहीं से नाटक एक बेहद दिलचस्प और नाटकीय मोड़ लेता है जो दर्शकों को हंसने पर मजबूर करने के साथ-साथ सोचने पर भी विवश करता है.
इस सफल नाट्य मंचन के मुख्य आयोजक और निर्देशक शिवेन्द्र शुक्ला ने समापन के अवसर पर क्षेत्र के युवाओं और कला प्रेमियों के प्रति आभार व्यक्त किया और अपने भविष्य के लक्ष्यों को साझा किया.
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