जबलपुर यूनिवर्सिटी की तैयार 'नर्मदा निधि' नस्ल से बैकयार्ड पोल्ट्री में बंपर कमाई, जानें खासियत

शहडोल सहित मध्य प्रदेश में ग्रामीण युवाओं के बीच नर्मदा निधि मुर्गी का पालन तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। जबलपुर पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय द्वारा विकसित यह नस्ल सालाना 170-190 अंडे देती है और कम खर्च में दोगुना मुनाफा प्रदान करती है।

Jul 21, 2026 - 12:40
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जबलपुर यूनिवर्सिटी की तैयार 'नर्मदा निधि' नस्ल से बैकयार्ड पोल्ट्री में बंपर कमाई, जानें खासियत

शहडोल। बदलते दौर के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर तलाश रहे युवाओं के बीच मुर्गी पालन (Poultry Farming) का व्यवसाय तेजी से लोकप्रिय हो रहा है. कम लागत में अधिक मुनाफे की संभावना के कारण यह स्वरोजगार बेरोजगार युवाओं की पहली पसंद बन रहा है. वर्तमान में 'नर्मदा निधि' नस्ल की मुर्गी को मुर्गी पालकों द्वारा काफी पसंद किया जा रहा है. इसकी मुख्य वजह यह है कि इसके रखरखाव और लालन-पालन में बहुत अधिक खर्च या मेहनत की आवश्यकता नहीं होती और यह बेहद कम समय में अधिक अंडे देने की क्षमता रखती है.

स्थानीय ग्रामीण विक्की गुप्ता बताते हैं कि युवाओं में इन दिनों पोल्ट्री फार्मिंग को लेकर जबरदस्त उत्साह देखा जा रहा है. बड़ी संख्या में युवा इस क्षेत्र में उतर रहे हैं और बेहतर आमदनी हासिल कर रहे हैं. जो लोग एक बार इस व्यवसाय से जुड़ रहे हैं, वे धीरे-धीरे अपने काम का विस्तार कर रहे हैं. इसमें जोखिम कम और मांग (Demand) हमेशा बनी रहती है. मुर्गियों और अंडों की बिक्री के लिए बाजार में भटकना भी नहीं पड़ता, क्योंकि स्थानीय स्तर पर ही इसकी भारी खपत है.

पोल्ट्री पालकों के बीच 'नर्मदा निधि' किस्म की मांग लगातार बढ़ रही है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे 'बैकयार्ड पोल्ट्री' (Backyard Poultry) यानी घर के पिछले हिस्से में बची थोड़ी सी खुली जगह में भी आसानी से पाला जा सकता है. यह नस्ल रसोई से बचे अन्न के दानों, जूठन और आसपास के कीड़े-मकोड़ों को खाकर ही अपना पोषण प्राप्त कर लेती है, जिससे दाने का अतिरिक्त खर्च शून्य के बराबर हो जाता है.

कृषि वैज्ञानिक डॉ. बी.के. प्रजापति का तकनीकी वक्तव्य:

"नर्मदा निधि एक उन्नत संकर (Crossbred) प्रजाति है, जिसे नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय, जबलपुर में विकसित किया गया है. इसे जबलपुर की प्रसिद्ध 'जबलपुर कलर' और झाबुआ के 'कड़कनाथ' मुर्गे का क्रॉस कराकर तैयार किया गया है. इसमें 25 प्रतिशत कड़कनाथ के औषधीय व रोग-प्रतिरोधक गुण तथा 75 प्रतिशत जबलपुर कलर मुर्गी के शारीरिक लक्षण आते हैं. बैकयार्ड पोल्ट्री के रूप में इसका प्रदर्शन अत्यंत उत्कृष्ट पाया गया है."

दोनों नस्लों की उत्पादन क्षमता और विशेषताओं का अंतर नीचे दी गई तालिका में आसानी से समझा जा सकता है:

मुख्य मापदंड / विशेषताएं सामान्य देसी मुर्गी उन्नत 'नर्मदा निधि' नस्ल
वार्षिक अंडा उत्पादन केवल 45 से 50 अंडे प्रति वर्ष 170 से 190 अंडे प्रति वर्ष
ढाई महीने में वजन (2.5 माह) काफी कम वृद्धि 800 ग्राम से 900 ग्राम तक
140 दिन में औसतन वजन लगभग 700-800 ग्राम 1.5 किलोग्राम (1.5 kg) तक
उपयोगिता का प्रकार सीमित उत्पादन डुअल पर्पज (मांस एवं अंडा दोनों हेतु)
रखरखाव व चारा खर्च सामान्य अत्यंत कम (घर के बचे भोजन से पालन)

नर्मदा निधि नस्ल के चूजे सामान्य देसी मुर्गियों की तुलना में बहुत तेजी से बढ़ते हैं. मात्र ढाई महीने की अवधि में इनका वजन 800 से 900 ग्राम हो जाता है, जबकि 140 दिनों (लगभग साढ़े चार महीने) में यह 1.5 किलो वजन हासिल कर लेते हैं.

यह नस्ल 'डुअल पर्पज' (Dual Purpose) के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है, यानी इसका उपयोग अंडा उत्पादन के साथ-साथ उच्च गुणवत्ता वाले मीट (मांस) के लिए भी किया जाता है. देसी मुर्गियों के मुकाबले तीन गुना से अधिक अंडे देने और स्वादिष्ट मांस होने के कारण बाजार में इसके अच्छे दाम मिलते हैं, जिससे किसानों को कम समय में ही लागत से कई गुना अधिक मुनाफा प्राप्त होता है.

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