होलकर राजघराने से जुड़ा है 3000 साल पुराना यह मंदिर, सावन और सिंहस्थ को लेकर खास तैयारियां

उज्जैन के तराना स्थित 2600 साल प्राचीन तिलभांडेश्वर महादेव मंदिर में महाकाल की तर्ज पर भस्म आरती और सवारी निकलती है। जानिए इस प्राचीन मंदिर का पूरा इतिहास।

Aug 01, 2026 - 11:56
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होलकर राजघराने से जुड़ा है 3000 साल पुराना यह मंदिर, सावन और सिंहस्थ को लेकर खास तैयारियां

उज्जैन: तराना तहसील मुख्यालय पर स्थित लगभग 2600 से 3000 साल प्राचीन 'तिलभांडेश्वर महादेव मंदिर' पूरे क्षेत्र में अपनी अनूठी मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है। यह प्राचीन मंदिर तराना सहित आसपास के 100 से अधिक गांवों के श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का मुख्य केंद्र है। इस ऐतिहासिक मंदिर की स्थापना होलकर राजवंश के काल में हुई थी, और ऐसी दृढ़ मान्यता है कि यहाँ विराजमान शिवलिंग स्वयंभू और अत्यंत जागृत हैं, जिनका आकार प्रत्येक वर्ष एक तिल के दाने के बराबर स्वतः बढ़ता जाता है। उज्जैन के विश्व प्रसिद्ध बाबा महाकाल की ही तर्ज पर तराना के इस तिलभांडेश्वर महादेव मंदिर में प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर दिन के समय भव्य भस्म आरती होती है, और सावन मास के दौरान निकलने वाली सवारी में भगवान को गार्ड ऑफ ऑनर भी प्रदान किया जाता है।

🐘 महाकाल भगवान की तर्ज पर निकाली जाएगी तिलभांडेश्वर महादेव की सवारी

मंदिर के गादीपति और महंत मोहन भारती ने जानकारी देते हुए बताया कि, ''इतिहास में महाकाल मंदिर सिंधिया स्टेट के अंतर्गत आता था, जबकि तिलभांडेश्वर भगवान का यह प्राचीन मंदिर होलकर स्टेट के अधीन था।''

यहाँ श्रावण मास (सावन) के दौरान तिलभांडेश्वर महादेव का विशेष और अलौकिक महत्व रहता है। सावन के पूरे महीने में प्रतिदिन भगवान शिव का विशेष शृंगार और रुद्राभिषेक किया जाता है। प्रत्येक सोमवार को बाबा महाकाल की सवारी की तर्ज पर ही यहाँ भी भव्य सवारी निकाली जाती है। भाद्रपद (भादो) महीने के दूसरे सोमवार को ठीक वैसी ही राजसी (शाही) सवारी निकाली जाती है, जैसी उज्जैन में महाकाल महाराज की निकलती है। इस सवारी में दूर-दराज से आने वाले नागा सन्यासी भी विशेष रूप से शामिल होते हैं। इस बार सिंहस्थ के नजदीक होने के कारण जूना अखाड़े का मुख्य पड़ाव भी यहीं रहने वाला है, जिससे इस आयोजन का महत्व और अधिक बढ़ गया है।

👑 महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने अपने प्रवास के दौरान करवाया था जीर्णोद्धार

महंत ने आगे बताया कि होलकर राजवंश की महान महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने अपने तराना प्रवास के दौरान इस ऐतिहासिक तिलभांडेश्वर मंदिर का भव्य जीर्णोद्धार करवाया था।

यह मंदिर तराना नगर सहित लगभग 100 ग्रामीण अंचलों के लोगों का प्रमुख आस्था केंद्र है। यही कारण है कि सावन के पवित्र महीने में यहाँ श्रद्धालुओं का भारी जनसैलाब उमड़ता है। इस शिवलिंग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह हर साल एक तिल के दाने के बराबर बढ़ता रहता है, जिसके चलते इसका नाम 'तिलभांडेश्वर' पड़ा। यहाँ सच्चे मन से पूजन-अर्चन करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

🚩 आज भी जीवंत हैं राजशाही काल की प्राचीन व्यवस्थाएं और परंपराएं

तिलभांडेश्वर मंदिर की मुख्य पहचान महाकाल मंदिर की तर्ज पर ही निकाली जाने वाली सवारी, पुलिस और प्रशासन द्वारा दिया जाने वाला गार्ड ऑफ ऑनर तथा महाशिवरात्रि पर होने वाली विशेष भस्म आरती से है।

जिस प्रकार उज्जैन में सावन के दौरान महाकाल की सवारियां निकलती हैं, उसी परंपरा का पालन करते हुए तराना में भी कुल 6 भव्य सवारियां निकाली जाती हैं, जिसमें हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। सावन मास के प्रत्येक सोमवार को बाबा तिलभांडेश्वर सुंदर पालकी में सवार होकर नगर भ्रमण पर निकलते हैं। महाकाल मंदिर के बाद मध्य प्रदेश का यह एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहाँ आज भी राजशाही काल की व्यवस्थाएं और परंपराएं उसी मूल स्वरूप में पूरी निष्ठा के साथ लागू हैं। महाशिवरात्रि के पर्व पर यहाँ साल में एक बार महाकाल की तर्ज पर ही भव्य भस्म आरती का आयोजन भी किया जाता है।

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