एमपी-राजस्थान सीमा विवाद में फंसी गांधी सागर पेयजल योजना, सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला

गांधी सागर पेयजल योजना एमपी और राजस्थान के बीच जमीन विवाद के कारण अधर में लटक गई है। राजस्थान वन विभाग की आपत्ति के बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश से काम रुक गया है।

Aug 02, 2026 - 15:53
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एमपी-राजस्थान सीमा विवाद में फंसी गांधी सागर पेयजल योजना, सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला

मंदसौर: मालवा इलाके के दो महत्वपूर्ण जिलों के लिए करोड़ों रुपए की लागत से तैयार की जा रही 'गांधी सागर पेयजल योजना' अब मध्य प्रदेश और राजस्थान की सरकारों के बीच चल रहे गंभीर जमीनी सीमा विवाद के कारण पूरी तरह अधर में लटक गई है। गांधी सागर झील के पानी को लिफ्ट करके मंदसौर और नीमच जिलों के घर-घर में पानी सप्लाई करने की इस बेहद जरूरी योजना के तहत, मध्य प्रदेश सरकार ने एक निजी कंपनी को सोलर प्लांट स्थापित करने और उसे सोलर मोटरों से जोड़ने का ठेका दिया है, ताकि हाइडल बिजली के अभाव में भी सोलर पंपों के माध्यम से लोगों को नियमित रूप से पानी की सप्लाई दी जा सके। लेकिन सरकार ने इस प्रोजेक्ट के लिए जिस निजी कंपनी को बिजली उत्पादन संयंत्र लगाने हेतु जमीन आवंटित की है, उस पर अब राजस्थान सरकार ने कड़ी आपत्ति जता दी है। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच जाने और स्टे मिलने के कारण यह बहुप्रतीक्षित योजना फिलहाल खटाई में पड़ गई है।

💧 राजस्थान की आपत्ति के बाद अधर में लटका गांधी सागर पेयजल योजना का काम

मानव निर्मित प्रसिद्ध झील गांधी सागर के पानी को मंदसौर और नीमच जिलों में सुलभ तरीके से सप्लाई करने के लिए करोड़ों रुपए की लागत से यह पेयजल स्कीम तैयार की गई है, जो अब राजस्थान सरकार के वन अमले की कानूनी आपत्तियों के कारण अटक गई है।

इस झील के पानी को दोनों जिलों में अलग-अलग सप्लाई देने के लिए सरकार ने गांधी सागर नंबर वन में छेमल और मंदसौर जिले के लिए एलबी महादेव सर्कल में दो पॉइंट बनाकर विभिन्न कंपनियों को इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट का ठेका सौंपा था।

🌳 वन विभाग की जमीन का हवाला देकर रुकवाया गया सोलर प्लांट का निर्माण

पेयजल सप्लाई का एक बड़ा और महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट होने के कारण सरकार ने इस स्कीम को पारंपरिक हाइडल बिजली के अलावा सोलर बिजली उत्पादन से भी जोड़ा है, ताकि बिना रुकावट के रोजाना पानी की सप्लाई सुनिश्चित की जा सके।

इस स्कीम के तहत मंदसौर जिले में सरकार ने एक नामी कंपनी को सुवासरा के ग्राम रामनगर और धनवाड़ा में 130 हेक्टेयर जमीन सोलर पैनल लगाकर बिजली उत्पादन की इकाई स्थापित करने के लिए आवंटित की थी। 1 अगस्त 2025 को आवंटित की गई इस जमीन पर कंपनी ने तेजी से बाउंड्री वॉल और पैनल के फाउंडेशन का काम शुरू कर दिया था, लेकिन मध्य प्रदेश और राजस्थान की सीमा पर स्थित इन दोनों गांवों की जमीन पर अब राजस्थान सरकार के वन विभाग ने इसे 'रिजर्व फॉरेस्ट' (आरक्षित वन) की जमीन बताते हुए अपना कानूनी दावा ठोक दिया है।

⚖️ काम हुआ बंद, मामला पहुँचा सुप्रीम कोर्ट, कंपनी ने दी सफाई

झालावाड़ के डग रिजर्व फॉरेस्ट के वन अमले ने शनिवार को मौके पर पहुंचकर कंपनी के सोलर प्लांट का चल रहा निर्माण कार्य रुकवा दिया और कार्यालय परिसर पर अदालत के नोटिस चस्पा कर दिए हैं। राजस्थान की एक निजी एनजीओ कंपनी और वहां के वन विभाग ने इस जमीन को सुरक्षित क्षेत्र बताते हुए सुप्रीम कोर्ट की शरण ली है।

अदालत के निर्देशों के अनुसार अब कंपनी ने भी फिलहाल डेवलपमेंट का सारा काम बंद कर दिया है। इस पूरे मामले पर नामी कंपनी के क्षेत्रीय मैनेजर सुनील तोमर ने बताया कि "शासन की विधिवत स्वीकृति मिलने के बाद प्रशासन ने राजस्व अमले की मौजूदगी में एक साल पहले ही जमीन का आवंटन कर प्लांट लगाने की मंजूरी दी थी।"

⚡ 400 करोड़ से बनेगा प्लांट, 100 मेगावाट बिजली का होगा उत्पादन

लगभग 400 करोड़ रुपए की भारी-भरकम लागत से बनने वाले इस प्लांट से कुल 100 मेगावाट बिजली का उत्पादन किया जाना है, जिससे मोटरों के जरिए रोजाना नियमित पेयजल सप्लाई होनी थी।

मध्य प्रदेश जल निगम की इस महत्वाकांक्षी योजना को दिसंबर 2026 तक पूरा किया जाना तय किया गया था, लेकिन राजस्थान सरकार के वन विभाग द्वारा अचानक आपत्ति खड़े किए जाने के कारण अब यह योजना तय समय सीमा पर पूरी होती नजर नहीं आ रही है। कंपनी अधिकारियों का कहना है कि जमीन अधिग्रहण के वक्त ही राजस्व अधिकारियों ने उन्हें 1903 और 1938 के पुराने बंदोबस्त के नक्शे उपलब्ध करवाए थे, जो कागजों में आज भी मध्य प्रदेश राज्य की सीमा के अंतर्गत ही आते हैं।

📍 राजस्थान बोला- हमारे पास मौजूद हैं दस्तावेज, सरपंच ने भी किया दावा

क्षेत्रीय मैनेजर ने बताया कि इन्हीं आधिकारिक दस्तावेजों के आधार पर कंपनी ने यहाँ करोड़ों रुपए का भारी निवेश किया है। उधर, शनिवार दोपहर के बाद राजस्थान के वन अमले ने मौके पर पहुंचकर डेवलपमेंट का काम तत्काल प्रभाव से बंद करवा दिया।

डग रिजर्व फॉरेस्ट के भू-गुआ परिक्षेत्र के रेंजर बलराम गौचर ने इस बारे में जानकारी देते हुए बताया कि "यह पूरी जमीन राजस्थान राज्य के अधिकार क्षेत्र की है और ग्राम सिंहपुर स्थित 1650 हेक्टेयर रिजर्व फॉरेस्ट का हिस्सा है। इसके सभी कानूनी दस्तावेज सरकार और वन विभाग के पास सुरक्षित मौजूद हैं। मामला अदालत में विचाराधीन होने के कारण ही काम रुकवाया गया है।"

इस पूरे मामले पर जल निगम केीय अधिकारी अली असगर ने बताया कि निगम ने पूरी प्रशासनिक जांच और मंजूरी के बाद ही प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाया था, लेकिन राजस्थान वन अमले के काम रुकवाने के बाद जब वे असल दस्तावेज लेकर मौके पर पहुँचे, तो वन अमले ने उन्हें मानने से इनकार कर दिया। दोनों राज्यों की सीमा पर स्थित इस जमीन के मामले में राजस्थान के सिंहपुर ग्राम के सरपंच राहुल सिंह ने भी इस जमीन को अपने गांव की सीमा का होने का दावा ठोक दिया है। दोनों राज्यों के बीच इस कानूनी विवाद के चलते गांधी सागर पेयजल योजना अब गहरी अड़चनों में फंस गई है, और अदालत के अंतिम फैसले के बाद ही इस पर आगे का काम शुरू होने की उम्मीद बचेगी।

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