नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज में बने ग्रीन कॉरिडोर, अंगदान से कई लोगों को मिला जीवन
जबलपुर के नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज में अंगदान और देहदान को लेकर जागरूकता बढ़ रही है। 2025 में बने ग्रीन कॉरिडोर के जरिए कई मरीजों को नया जीवन मिला है।
मध्य प्रदेश के जबलपुर स्थित नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज और सुपर स्पेशलिटी अस्पताल से अंगदान के क्षेत्र में बेहद प्रेरणादायक और सकारात्मक खबरें सामने आ रही हैं। साल 2025 के दौरान यहां दो माह के भीतर दो और अगस्त में एक ग्रीन कॉरिडोर बनाकर इतिहास रचा गया, जहाँ असमय दुनिया छोड़कर जाने वाले लोगों के अंगों ने कई अन्य गंभीर मरीजों को नया जीवनदान दिया। समाज में फैली भ्रांतियों को दूर करने के लिए अब मेडिकल टीम के साथ-साथ साधु-संतों और धर्मगुरुओं की भी मदद ली जा रही है, ताकि लोग जागरूक होकर अंगदान और देहदान के लिए आगे आ सकें।
🚗 वर्ष 2025 में मेडिकल कॉलेज में बने तीन महत्वपूर्ण ग्रीन कॉरिडोर
जबलपुर के मेडिकल कॉलेज में अंगदान और अंगों के त्वरित परिवहन के लिए पिछले साल तीन बार ग्रीन कॉरिडोर का सफल निर्माण किया गया, जिनका विवरण इस प्रकार है:
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जनवरी 2025: 61 वर्षीय ब्रेन डेड बलिराम कुशवाहा (जो सड़क हादसे में शिकार हुए थे) के अंगों को दान किया गया। उनका हृदय विमान से एम्स भोपाल और लिवर हेलीकॉप्टर के माध्यम से इंदौर के चोइथराम अस्पताल भेजा गया।
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मार्च 2025: 56 वर्षीय राजमिस्त्री पूरन चौधरी के निधन के बाद उनकी दोनों किडनियों को जरूरतमंद मरीजों में ट्रांसप्लांट किया गया, जिसमें एक किडनी इंदौर और एक जबलपुर के निजी अस्पताल भेजी गई।
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अगस्त 2025: सिवनी के एक युवक सत्येंद्र यादव के ब्रेन डेड होने पर उनके परिजनों ने अंगदान का फैसला किया, जिसके तहत हार्ट अहमदाबाद, लीवर भोपाल और एक किडनी जबलपुर के मरीज को सफलतापर्वक ट्रांसप्लांट की गई।
🕯️ मरणोपरांत देहदान का संकल्प और परिवार द्वारा सम्मान का अनूठा उदाहरण
केवल अंगदान ही नहीं, बल्कि जबलपुर जिले की मझौली तहसील के पोंडा गांव निवासी कैलाश दास चौधरी ने अपने जीवनकाल में ही 'देहदान' का संकल्प लिया था। उनके निधन के बाद उनके परिवार—पत्नी और चारों बेटों (जिनमें बड़े बेटे अनिल दास भी शामिल हैं)—ने उनकी इस अंतिम इच्छा का पूर्ण सम्मान किया। उनके पार्थिव शरीर को नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज को सौंपा गया, जहाँ मेडिकल डीन डॉ. नवनीत सक्सेना, डॉ. राजेंद्र कुशवाहा और डॉ. एन.एल. अग्रवाल ने इस कदम की सराहना की। इस सेवाभावी और मानवहितकारी निर्णय के लिए उनके पार्थिव शरीर को 'गार्ड ऑफ ऑनर' से सम्मानित किया गया, ताकि चिकित्सा शिक्षा और शोध के क्षेत्र में यह प्रेरणा हमेशा बनी रहे।
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