4 दशक बाद भी जारी नहीं हुई ओंकारेश्वर अभयारण्य की अधिसूचना, MP हाईकोर्ट ने जारी किया नोटिस
ओंकारेश्वर वन्यजीव अभयारण्य की अधिसूचना चार दशक से जारी नहीं होने पर MP हाईकोर्ट ने स्टेट वाइल्ड लाइफ बोर्ड भोपाल को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
मध्य प्रदेश के बहुचर्चित ओंकारेश्वर वन्यजीव अभयारण्य (Omkareshwar Wildlife Sanctuary) की अधिसूचना चार दशक (40 साल) का लंबा समय गुजर जाने के बावजूद अब तक जारी नहीं की जा सकी है। इस गंभीर मामले को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की मुख्य खंडपीठ जबलपुर में एक जनहित याचिका दायर की गई थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट के एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने सुनवाई की और 'स्टेट वाइल्ड लाइफ बोर्ड भोपाल' को नोटिस जारी कर इस संबंध में जवाब तलब किया है। अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 28 सितंबर की तारीख निर्धारित की है।
📜 दिल्ली निवासी की याचिका में उठाए गए बड़े सवाल, नर्मदा सागर परियोजना से जुड़ा है मामला
यह जनहित याचिका दिल्ली निवासी नरेश चौधरी की ओर से दायर की गई है। याचिका में मुख्य रूप से यह तर्क दिया गया है कि नर्मदा सागर (इंदिरा सागर) बहुउद्देशीय परियोजना के लिए वर्ष 1987 में केंद्र सरकार द्वारा 41,111 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि के डायवर्जन की मंजूरी दी गई थी। इस विशाल वन भूमि के जलमग्न होने और उससे पर्यावरण पर पड़ने वाले विपरीत प्रभावों को संतुलित करने के लिए एक वन्यजीव संरक्षण उपाय के रूप में ओंकारेश्वर वन्यजीव अभयारण्य की स्थापना की रूपरेखा तैयार की गई थी। भारत सरकार ने अपनी मंजूरी की शर्त क्रमांक 9 में इसे विशेष रूप से शामिल किया था, ताकि पारिस्थितिकी तंत्र को बचाया जा सके।
🐅 बाघों के सुरक्षित कॉरिडोर के लिए क्यों जरूरी है ओंकारेश्वर अभयारण्य?
याचिकाकर्ता के अनुसार, सभी आवश्यक प्रशासनिक और तकनीकी प्रक्रियाएं पूरी होने तथा राज्य वन्यजीव बोर्ड की अनुमति मिलने के बाद भी इस अभयारण्य की अंतिम अधिसूचना आज तक जारी नहीं की गई है। प्रस्तावित अभयारण्य खंडवा और देवास जिलों के बीच लगभग 614.07 वर्ग किलोमीटर के विशाल क्षेत्र में फैला हुआ है, जिसमें किसी भी प्रकार का राजस्व गांव शामिल नहीं है। यह क्षेत्र रातापानी-खिवनी-ओंकारेश्वर-मऊ-धार-सरदारपुर जैसे महत्वपूर्ण वन्यजीव कॉरिडोर का एक अभिन्न हिस्सा है। खिवनी अभयारण्य में बाघों की बढ़ती संख्या और क्षेत्रीय संघर्ष को देखते हुए ओंकारेश्वर का यह क्षेत्र बाघों के सुरक्षित आवागमन और उनके संरक्षण के लिए अत्यंत आवश्यक माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी ने भी इस अधिसूचना में हो रही लंबी देरी पर गहरी चिंता व्यक्त की थी, जिसे याचिका में मनमाना और असंवैधानिक बताया गया है।
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