आईआईटी इंदौर के शोधकर्ताओं ने विकसित की ओरल कैंसर की शुरुआती पहचान की सुई-रहित तकनीक

आईआईटी इंदौर के शोधकर्ताओं ने ओरल कैंसर की शुरुआती पहचान के लिए आसान और सुई-रहित तकनीक विकसित की है। अब केवल लार और स्वैब के सैंपल से बीमारी का पता चल सकेगा।

Aug 13, 2026 - 15:06
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आईआईटी इंदौर के शोधकर्ताओं ने विकसित की ओरल कैंसर की शुरुआती पहचान की सुई-रहित तकनीक

हमारे देश में ओरल कैंसर एक गंभीर और बड़ी चुनौती बनता जा रहा है, जिसकी समय रहते पहचान करना बेहद जटिल माना जाता है। आमतौर पर यह बीमारी अपने उन्नत चरण में पहुंचने के बाद ही सामने आती है, जिसका मुख्य कारण पारंपरिक बायोप्सी जांच का इनवेसिव (दर्दनाक और जटिल) होना है। जोखिम वाले मरीजों की नियमित निगरानी के लिए बार-बार बायोप्सी करना व्यावहारिक नहीं होता। इसी समस्या का समाधान निकालते हुए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT Indore) के शोधकर्ताओं ने ओरल कैंसर का शुरुआती दौर में ही पता लगाने वाली एक बेहद आसान और सुई-रहित (Non-Invasive) विधि विकसित कर ली है।

🧪 लार (सैलाइवा) और स्वैब के सैंपल से होगी बीमारी की सटीक जांच

आईआईटी इंदौर के मेहता फैमिली स्कूल ऑफ बायोसाइंसेज एंड बायोमेडिकल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर हेमचंद्र झा के नेतृत्व में डॉ. तरुण प्रकाश वर्मा ने यह नई जांच विधि विकसित की है। इस महत्वपूर्ण अध्ययन में गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ डेंटिस्ट्री, इंदौर के डॉ. दीपक अग्रवाल भी शामिल रहे। शोधकर्ताओं ने मुख्य रूप से 'ओरल स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा' (जो ओरल कैंसर का सबसे सामान्य प्रकार है) और 'ओरल सबम्यूकस फाइब्रोसिस' (जो गुटखा, सुपारी या तंबाकू खाने से होता है और बाद में कैंसर बन सकता है) की स्थितियों पर अध्ययन केंद्रित किया। लार और मुंह के अंदर से लिए गए एक साधारण सॉफ्ट स्वैब के जरिए कोशिकाओं और प्रोटीन्स को एकत्र कर 'लिक्विड क्रोमैटोग्राफी-मास स्पेक्ट्रोमेट्री' तकनीक से स्वस्थ लोगों और मरीजों के नमूनों की तुलना की गई।

💰 किफायती, त्वरित और बीमारी के स्पष्ट लक्षण दिखने से पहले ही पहचान

शोधकर्ताओं ने पाया कि शरीर में वसा, ऊर्जा, ऑक्सीडेटिव तनाव और ऊतक मरम्मत (टिशु रिपेयर) से जुड़े विशिष्ट परिवर्तनों की पहचान बीमारी के स्पष्ट रूप से प्रकट होने से पहले ही लार के माध्यम से की जा सकती है। प्रोफेसर हेमचंद्र झा ने बताया कि इस तकनीक का मुख्य उद्देश्य नॉन-इनवेसिव संकेतों को ऐसे व्यावहारिक उपकरणों में बदलना है, जिससे उच्च जोखिम वाले मरीजों की शुरुआती पहचान और नियमित निगरानी आसानी से हो सके। यह नई तकनीक बेहद किफायती, त्वरित, प्वाइंट-ऑफ-केयर और पूरी तरह से नॉन-इनवेसिव है, जो चिकित्सा जगत में मील का पत्थर साबित हो सकती है।

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