बुरहानपुर का यह मुस्लिम परिवार अंग्रेजों के जमाने से बना रहा है तिरंगा, दो पीढ़ियों से जारी है परंपरा

बुरहानपुर का एक मुस्लिम परिवार अंग्रेजों के जमाने से हाथ से तिरंगा बनाने का काम कर रहा है। आज भी यह परिवार पूरी जिम्मेदारी से देश की इस विरासत को संजोए हुए है।

Aug 13, 2026 - 18:49
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बुरहानपुर का यह मुस्लिम परिवार अंग्रेजों के जमाने से बना रहा है तिरंगा, दो पीढ़ियों से जारी है परंपरा

मध्य प्रदेश सहित पूरे देश में स्वतंत्रता दिवस के पावन पर्व को लेकर राष्ट्रीय ध्वज की खरीदी में जबरदस्त उत्साह देखा जा रहा है। इस बीच ऐतिहासिक शहर बुरहानपुर से देशभक्ति की एक बेहद प्रेरणादायक और अनूठी दास्तान सामने आई है, जहाँ जामा मस्जिद का पूरा क्षेत्र इन दिनों तिरंगे के रंगों में रंगा हुआ नजर आ रहा है। इस इलाके में एक ऐसा मुस्लिम परिवार रहता है, जो पिछले दो दशकों और दो पीढ़ियों से पूरी शिद्दत के साथ तिरंगा तैयार करने के काम को मजबूती से थामे हुए है। आज भी यह परिवार अपनी इस पारंपरिक कला के जरिए देश के प्रति अपना अटूट प्रेम और सम्मान साबित कर रहा है।

🧵 अंग्रेजों के दौर से शुरू हुई कहानी, आज भी सुरक्षित रखी है तिरंगा छापने वाली प्राचीन डाई

यह गौरवशाली कहानी जामा मस्जिद क्षेत्र में रहने वाले हनीफ भाई और उनके बेटे लियाकत हुसैन के परिवार की है। बुजुर्ग हनीफ भाई ने अंग्रेजों के शासन वाले भारत में चोरी-छिपे तिरंगा बनाने और उसे स्वतंत्रता सेनानियों तक पहुँचाने का जोखिम भरा काम शुरू किया था। अंग्रेजों के कड़े भय को दरकिनार करते हुए उन्होंने देशहित में जो भूमिका निभाई थी, उसे आज उनके बेटे लियाकत हुसैन पूरी निष्ठा से आगे बढ़ा रहे हैं। लियाकत का दावा है कि अंग्रेजों के जमाने की वह ऐतिहासिक डाई आज भी उनके पास पूरी तरह सुरक्षित रखी है। हालांकि आधुनिक बाजार में रेडीमेड झंडे आसानी से मिल जाते हैं, लेकिन आज भी कई सरकारी दफ्तरों और सच्चे देशप्रेमियों की पहली पसंद यही हाथ से बने तिरंगे होते हैं। उनके पास 50 रुपए से लेकर 1800 रुपए तक के विभिन्न साइज के तिरंगे उपलब्ध हैं।

🤝 सिलाई के हर टांके में देश की एकता, लियाकत की पत्नी सिलती हैं कपड़े और वे खुद छापते हैं अशोक चक्र

समय के साथ देश आजाद हुआ और राष्ट्रीय ध्वज के स्वरूप में भी बदलाव आया, जहाँ पहले तिरंगे पर चरखा छपता था, वहीं अब अशोक चक्र अंकित किया जाता है। लेकिन इस परिवार ने अपनी परंपरा को कभी नहीं टूटने दिया। लियाकत हुसैन खुद हाथ से तिरंगे पर अशोक चक्र छापते हैं, जबकि उनकी पत्नी कपड़े की सिलाई कर तिरंगा तैयार करती हैं। उनका कहना है कि यह सिर्फ कपड़े के तीन रंग नहीं हैं, बल्कि उनके पूर्वजों की अमूल्य विरासत और देश के प्रति उनका सबसे बड़ा सम्मान है। सिलाई के हर एक टांके के साथ यह परिवार देश की एकता और अखंडता की अनूठी कहानी बयां कर रहा है।

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