नर्मदा और शिप्रा समेत प्रदेश की नदियां हो रही हैं दूषित, 352 निकायों में सीवेज ट्रीटमेंट की पुख्ता व्यवस्था नहीं
मध्य प्रदेश में करोड़ों की योजनाओं के बावजूद नदियों का शुद्धिकरण नहीं हो पाया है। एनजीटी ने 352 निकायों से बिना ट्रीटमेंट के बह रहे सीवेज पर चिंता जताई है।
मध्य प्रदेश की पवित्र नदियां जैसे नर्मदा, शिप्रा और अन्य जल स्रोत करोड़ों रुपये की योजनाओं के बाद भी शुद्ध नहीं हो पा रही हैं। सरकार के तमाम दावों और वादों की पोल नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के समक्ष प्रस्तुत किए गए आधिकारिक आंकड़ों से खुल गई है। रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि राज्य के 352 नगरीय निकायों से निकलने वाले सीवेज को ट्रीटमेंट करने की सरकार के पास अब तक कोई ठोस और पुख्ता व्यवस्था नहीं है। इस बड़ी लापरवाही के कारण हर दिन लगभग 637 एमएलडी (MLD) सीवेज नालों के जरिए सीधे प्रदेश की प्रमुख नदियों और उनकी सहायक धाराओं में मिल रहा है, जिससे जलीय जीवों और पर्यावरण पर भारी संकट मंडरा रहा है।
📋 शपथ-पत्र से हुआ खुलासा: 352 निकायों में एसटीपी प्लांट का अभाव
मध्य प्रदेश को 'नदियों का मायका' कहा जाता है, जहां छोटी-बड़ी करीब 207 नदियां प्रवाहित होती हैं। इनमें धार्मिक आस्था का केंद्र मां नर्मदा और पौराणिक महत्व वाली शिप्रा नदी भी शामिल हैं। नदियों की पवित्रता बनाए रखने के नाम पर भारी-भरकम बजट और योजनाएं बनाई जाती हैं, लेकिन एनजीटी में प्रस्तुत किए गए शपथ-पत्र और रिपोर्ट के परीक्षण से यह उजागर हुआ कि राज्य के 413 नगरीय निकायों में से 352 निकायों के पास सीवेज उपचारित करने के लिए एसटीपी (STP) प्लांट ही मौजूद नहीं हैं। हालांकि शासन ने भविष्य में 735 एमएलडी सीवेज ट्रीटमेंट के लिए प्लांट लगाने का प्रस्ताव रखा है, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति बेहद चिंताजनक बनी हुई है।
⚠️ एनजीटी की कड़ी फटकार: मुख्य सचिव को कंप्लायंस रिपोर्ट पेश करने के निर्देश
मामले की गंभीरता को देखते हुए एनजीटी ने गहरी चिंता व्यक्त की है। ट्रिब्यूनल ने पाया कि प्रदेश के 352 निकायों से निकलने वाले 1315 नालों का गंदा पानी बिना किसी ट्रीटमेंट के सीधे जल संरचनाओं में समा रहा है। एनजीटी ने मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव को सख्त आदेश दिए हैं कि वे आगामी सुनवाई से पहले ठोस एवं तरल अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2016 के अनुपालन से जुड़ी विस्तृत कंप्लायंस रिपोर्ट प्रस्तुत करें। बता दें कि पिछले एक माह के भीतर पर्यावरण और जल संरक्षण को लेकर एनजीटी का यह दूसरा बड़ा और कड़ा आदेश है, जिससे प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मचा हुआ है।
🌳 पर्यावरणविदों का तंज: कागजी आदेशों तक सीमित है योजनाएं, धरातल पर नहीं हो रहा पालन
मामले के याचिकाकर्ता और वरिष्ठ पर्यावरणविद् डॉ. सुभाष पांडे के मुताबिक, एनजीटी ने पेड़ों की प्रजातियों के संरक्षण, ग्रीन बेल्ट से अतिक्रमण हटाने और पर्यावरण सुधार के लिए कई ऐतिहासिक आदेश दिए हैं, लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह है कि इन आदेशों का जमीनी स्तर पर सही से पालन नहीं किया जा रहा है। उन्होंने दो टूक कहा कि अदालती निर्देशों की अवहेलना करने वाले और लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ अब कोर्ट को और भी अधिक सख्त रुख अपनाना चाहिए, तभी प्रदेश की नदियों और पर्यावरण को बचाया जा सकेगा।
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