शाहपुर के दंपत्ति ने खेत में एक साथ लगाए तीन किस्म के केले, केरल की इस खेती से होगी 4 गुना कमाई
बुरहानपुर के शाहपुर में एक किसान दंपत्ति ने मिश्रित खेती का अनोखा प्रयोग करते हुए लाल, पीले और इलायची केले की फसल उगाई है, जिससे बंपर मुनाफा हो रहा है।
मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले में कृषि क्षेत्र में नई तकनीकों और नवाचारों के जरिए किसान अब कम समय में बेहतर उत्पादन और शानदार मुनाफा हासिल कर रहे हैं। शाहपुर के रहने वाले प्रगतिशील किसान चंद्रकांत लांडे और उनकी पत्नी आरती लांडे ने भी कुछ ऐसा ही कर दिखाया है। इस दंपत्ति ने केले की पारंपरिक खेती से हटकर एक नया प्रयोग किया है और अपने खेतों में एक साथ तीन अलग-अलग किस्मों के केले—यानी लाल केला, पीला केला और इलायची केला—की खेती की है। आमतौर पर केरल जैसे राज्यों में उगाई जाने वाली इन विशेष किस्मों के कुल 600 पौधे उनके खेत में लहलहा रहे हैं, जिनमें 200 पौधे लाल केले, 200 पीले केले और 200 पौधे इलायची केले के शामिल हैं।
💰 बाजार में है भारी मांग: महज 50 हजार की लागत से तैयार हुई फसल, मिल रही 4 गुना आमदनी की उम्मीद
अलग-अलग किस्म के इन केलों की राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में भारी मांग होने के कारण इनकी कीमत भी काफी अच्छी मिलती है। किसान दंपति ने सितंबर 2025 में इन पौधों को लगाया था, जो महज एक साल के भीतर ही बेहतर तरीके से उत्पादित हो गए हैं। इस पूरी खेती में लगभग 50 हजार रुपये का खर्च आया है, जिसके एवज में उन्हें सामान्य खेती की तुलना में 4 गुना तक अधिक आमदनी होने की उम्मीद है। इस अनोखे प्रयोग को देखने के लिए दूर-दूर से अन्य किसान भी उनके खेतों में पहुँच रहे हैं और मिश्रित खेती की बारीकियां सीख रहे हैं। लाल और इलायची केले की इस अनोखी फसल को लेकर आम लोगों और व्यापारियों में भी काफी उत्सुकता देखने को मिल रही है।
🌱 निजी कंपनी के सहयोग से सफल हुआ प्रयोग, 12 महीने में ही तैयार हो गए 15 से 20 फीट ऊंचे पौधे
किसान चंद्रकांत लांडे ने बताया कि उन्होंने एक निजी कंपनी की मदद से इस नए प्रयोग को अपनाया था। सामान्यतः इन किस्मों के पौधे 14 महीने में तैयार होते हैं, लेकिन उनके खेतों में यह महज 12 महीने में ही तैयार होकर बंपर पैदावार देने लगे हैं। प्रति पौधे लगभग 80 रुपये का खर्च आया है और इससे करीब 35 से 40 क्विंटल उत्पादन की उम्मीद है। इन पौधों की लंबाई 15 से 20 फीट तक होती है और इनकी देखभाल भी काफी सरल है, जिसमें नियमित पानी, जैविक खाद और उचित देखरेख की जरूरत होती है। बुरहानपुर की धरती पर हुआ यह सफल प्रयोग अब क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणा का बड़ा स्रोत बन गया है।
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