जन्माष्टमी से बछ बारस तक उज्जैन के गोपाल मंदिर में नहीं होती शयन आरती, जानिए बाल स्वरूप से जुड़ी परंपरा

उज्जैन के द्वारकाधीश गोपाल मंदिर में जन्माष्टमी से बछ बारस तक शयन आरती नहीं होती है। जानिए मंदिर के चांदी के दरवाजों और श्रीकृष्ण की अनूठी परंपरा का इतिहास।

Sep 03, 2026 - 19:07
0
जन्माष्टमी से बछ बारस तक उज्जैन के गोपाल मंदिर में नहीं होती शयन आरती, जानिए बाल स्वरूप से जुड़ी परंपरा

मध्य प्रदेश की पवित्र नगरी उज्जैन में स्थित ऐतिहासिक द्वारकाधीश गोपाल मंदिर में इतिहास के संघर्षों और कृष्ण भक्ति की सदियों पुरानी परंपराओं का अनूठा संगम देखने को मिलता है। इस मंदिर के चांदी मढ़े दरवाजों से जुड़ी प्रचलित ऐतिहासिक कथा सोमनाथ से शुरू होकर गजनी और लाहौर के रास्ते सिंधिया शासनकाल में उज्जैन तक पहुँचती है। इस प्राचीन मंदिर में विराजित बाल स्वरूप भगवान श्रीकृष्ण की दिनचर्या भी आम मंदिरों से बिल्कुल अलग है। मान्यता है कि जन्माष्टमी के बाद भगवान बाल स्वरूप में होते हैं, इसलिए उनके सोने और जागने का कोई निश्चित समय नहीं माना जाता है, जिसके चलते जन्माष्टमी से लेकर बछ बारस तक के 5 दिनों तक मंदिर में भगवान की शयन आरती नहीं की जाती है।

📜 सोमनाथ मंदिर से जुड़े हैं चांदी के दरवाजे, महमूद गजनवी और अहमद शाह अब्दाली के दौर से गुजरा इतिहास

मध्य प्रदेश पुरातत्व विभाग द्वारा मंदिर परिसर में लगाए गए बोर्ड पर दी गई जानकारी के अनुसार, गोपाल मंदिर के इन चांदी मढ़े दरवाजों का इतिहास काफी रोमांचक और संघर्षपूर्ण रहा है। मान्यता है कि मूल रूप से ये दरवाजे सोमनाथ मंदिर का हिस्सा थे, जिन्हें आक्रमण के दौरान महमूद गजनवी अपने साथ गजनी ले गया था। इसके बाद के कालखंड में अफगान शासक अहमद शाह दुरानी यानी अब्दाली के समय ये दरवाजे लाहौर पहुँचे। 19वीं सदी में सिंधिया राजवंश के शासनकाल के दौरान इन्हें वापस भारत लाया गया और उज्जैन में महारानी बैजीबाई शिंदे द्वारा बनवाए गए द्वारकाधीश गोपाल मंदिर में स्थापित किया गया। हालांकि, इतिहासविदों के अनुसार इस पूरी यात्रा को लोक स्मृतियों और प्रचलित मान्यताओं के रूप में देखा जाता है, जिसके हर चरण के दस्तावेजी प्रमाणों को लेकर अलग-अलग मत भी मौजूद हैं।

👶 जन्माष्टमी से बछ बारस तक नहीं होती शयन आरती, 4 सितंबर को मचेगी भव्य जन्मोत्सव की धूम

मंदिर के पुजारी पावन शर्मा बताते हैं कि जन्माष्टमी के पावन पर्व के बाद भगवान को बाल स्वरूप में माना जाता है, और चूंकि एक छोटे बालक के सोने का कोई निश्चित समय नहीं होता, इसलिए जन्माष्टमी से बछ बारस तक मंदिर में शयन आरती की परंपरा को विराम दिया जाता है। इस बार 4 सितंबर 2026 को गोपाल मंदिर में जन्माष्टमी का पर्व अत्यंत धूमधाम से मनाया जाएगा। इस विशेष अवसर पर सुबह राजभोग आरती के दौरान 1100 किलो पेड़े का महाप्रसाद वितरित किया जाएगा, संध्या आरती के बाद भगवान का भव्य महाभिषेक होगा, और रात ठीक 12 बजे जन्म आरती के बाद श्रद्धालु करीब 2 बजे तक भगवान के दर्शन कर सकेंगे। बछ बारस के दिन दोपहर में मटकी फोड़ आयोजन के बाद भगवान की शयन आरती होगी, और त्रयोदशी से पुनः नियमित शयन आरती का क्रम शुरू हो जाएगा।

What's Your Reaction?

Like Like 0
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Wow Wow 0
Sad Sad 0
Angry Angry 0

Comments (0)

User