ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में डॉलर पर निर्भरता घटाने की तैयारी, यूपीआई और सीबीडीसी को जोड़ने पर मंथन
भारत में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में डॉलर की निर्भरता कम करने और यूपीआई मॉडल को सीबीडीसी के साथ जोड़ने पर अहम चर्चा होगी।
भारत में आयोजित होने वाले ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन में इस बार केवल कारोबार और निवेश जैसे पारंपरिक मुद्दों पर ही चर्चा नहीं होगी, बल्कि वैश्विक वित्तीय व्यवस्था और भुगतान के तरीकों को पूरी तरह बदलने की दिशा में भी बड़े कदम उठाए जाने की तैयारी है। ब्रिक्स देशों के बीच अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने और स्थानीय मुद्राओं (लोकल करेंसी) में भुगतान को बेहद आसान बनाने के लिए क्रॉस-बॉर्डर डिजिटल पेमेंट्स और सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) को आपस में जोड़ने के विकल्पों पर गंभीरता से काम चल रहा है। इस पूरी कूटनीतिक और आर्थिक कवायद में भारत का 'यूपीआई' (UPI) मॉडल सबसे खास केंद्र बिंदु बना हुआ है, क्योंकि भारत चाहता है कि जिस तरह यूपीआई ने देश के भीतर क्रांतिकारी बदलाव किए हैं, उसी तरह ब्रिक्स देशों के फास्ट पेमेंट सिस्टम्स को भी जोड़ा जाए।
🤝 नई साझा मुद्रा नहीं, बल्कि पेमेंट कनेक्टिविटी और लोकल करेंसी सेटलमेंट पर जोर
अक्सर ब्रिक्स देशों में डॉलर से दूरी की खबरों को एक नई साझा मुद्रा के रूप में देखा जाता है, लेकिन फिलहाल वास्तविकता इससे थोड़ी अलग और अधिक व्यावहारिक है। इस समय ब्रिक्स का मुख्य लक्ष्य कोई नई साझा करेंसी जारी करना नहीं, बल्कि सदस्य देशों की मौजूदा नेशनल करेंसी और डिजिटल पेमेंट्स प्लेटफॉर्म्स को आपस में लिंक करना है। इसका मतलब यह है कि भारत और रूस या अन्य ब्रिक्स देशों के आपसी व्यापार का सेटलमेंट उनकी अपनी स्थानीय मुद्राओं में हो सके और इसके लिए एक मजबूत डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जा सके। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भी ब्रिक्स देशों के बीच फास्ट पेमेंट सिस्टम को जोड़ने और सीबीडीसी की इंटरऑपरेबिलिटी पर चर्चा की पुष्टि की है, जिससे भारतीय कारोबारियों को लेन-देन में भारी राहत मिलने की उम्मीद है।
⚠️ चीन की भूमिका और तकनीकी चुनौतियों के बीच भारत के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए बड़ा अवसर
हालाँकि, इस तरह का साझा पेमेंट नेटवर्क तैयार करना इतना आसान नहीं होगा क्योंकि सभी सदस्य देशों के बैंकिंग नियम, रेगुलेशन, साइबर सिक्योरिटी और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर एक-दूसरे से काफी अलग हैं। चीन जैसे बड़े सदस्य देश के अपने डिजिटल फाइनेंशियल सिस्टम को देखते हुए डेटा प्रोटेक्शन और सिक्योरिटी जैसे सवाल भी अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं। इन तमाम व्यावहारिक चुनौतियों के बावजूद, अगर दिल्ली ब्रिक्स समिट में इस दिशा में कोई ठोस सहमति बनती है, तो यह न केवल ब्रिक्स देशों के बीच आपसी व्यापार को गति देगा, बल्कि भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और यूपीआई मॉडल को वैश्विक पटल पर एक नई और ऐतिहासिक पहचान दिलाने का सबसे बड़ा अवसर साबित होगा।
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