आत्महत्या के मामलों में देश में तीसरे नंबर पर MP, जानें क्यों बढ़ रहा तनाव और क्या हैं चेतावनी के संकेत
एनसीआरबी 2023 की रिपोर्ट के अनुसार मध्य प्रदेश में रोजाना औसतन 43 लोग आत्महत्या कर रहे हैं। पुरुषों में यह संख्या महिलाओं से 3 गुना अधिक है। जानें मुख्य कारण और चेतावनी के संकेत।
भोपाल। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) 2023 की नवीनतम रिपोर्ट के आंकड़ों पर नजर डालें तो मध्य प्रदेश में एक साल के भीतर 15,662 लोगों ने आत्महत्या की है। इसका सीधा अर्थ यह है कि देश भर में दर्ज होने वाली हर 11वीं आत्महत्या मध्य प्रदेश से ही सामने आ रही है। वहीं, राष्ट्रीय स्तर पर आत्महत्या करने वालों में पुरुषों की संख्या महिलाओं की तुलना में लगभग तीन गुना पाई गई है। गांधी मेडिकल कॉलेज (GMC) भोपाल के वरिष्ठ डॉक्टर जेपी अग्रवाल के अनुसार, आत्महत्या से ठीक पहले व्यक्ति के व्यवहार में अचानक बदलाव, अत्यधिक गुमसुम रहना या नशे की ओर बढ़ना जैसे कई स्पष्ट संकेत दिखते हैं, जिन्हें समय रहते पहचानना और संभालना बेहद जरूरी है।
📈 2018 से 2023 तक देश में लगातार बढ़े मामले, 5 वर्षों में 36 हजार से अधिक का उछाल
एनसीआरबी के आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि देश में आत्महत्याओं का ग्राफ पिछले 6 वर्षों में तेजी से बढ़ा है। वर्ष 2018 में देश भर में करीब 1,34,516 आत्महत्याएं दर्ज हुई थीं, जो 2023 में बढ़कर 1,71,418 तक पहुंच गईं। यानी महज 5 साल में 36,902 मामलों की भारी बढ़ोतरी हुई है। साल-दर-साल के रुझान को देखें तो इसमें हर साल औसतन 4 से 5 प्रतिशत की दर से वृद्धि दर्ज की जा रही है।
गांधी मेडिकल कॉलेज के डॉ. जेपी अग्रवाल ने इस बढ़ती प्रवृत्ति को अत्यंत चिंताजनक बताया है। उनके अनुसार, सामाजिक ताने-बाने में बदलाव और बढ़ता मानसिक तनाव इसके प्रमुख कारण हैं।
⏱️ मध्य प्रदेश में रोजाना औसतन 43 लोग गंवा रहे जान, हर 34 मिनट में एक त्रासदी
यदि मध्य प्रदेश के 15,662 मामलों का 365 दिनों के हिसाब से विश्लेषण करें तो वर्ष 2023 में प्रदेश में रोजाना औसतन करीब 43 लोगों ने अपनी जीवनलीला समाप्त की है। यानी औसतन हर 34 मिनट में एक आत्महत्या पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज की गई। राष्ट्रीय स्तर पर वर्ष 2023 में आत्महत्या की दर 12.3 प्रति लाख आबादी रही, जबकि मध्य प्रदेश की कुल जनसंख्या के अनुपात में यह मानसिक स्वास्थ्य का बोझ राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक गंभीर बना हुआ है।
🌆 मेट्रो और बड़े शहरों में बढ़ रहा दबाव, ग्रामीण और शहरी जीवन के अंतर से बढ़ा तनाव
एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक, देश के 53 बड़े शहरों में साल 2023 में कुल 26,095 आत्महत्याएं दर्ज हुईं। इन महानगरों में आत्महत्या की दर 16.2 प्रति लाख आबादी रही, जो कि राष्ट्रीय औसत (12.3) से लगभग एक-तिहाई अधिक है।
डॉ. जेपी अग्रवाल के मुताबिक, "ग्रामीण और शहरी परिवेश में बड़ा अंतर आया है। शहरों में जीवन अत्यंत तेज और भागदौड़ भरा हो गया है, संयुक्त परिवार टूटकर एकल हो रहे हैं और आपस में दिल की बात साझा करने की कमी आई है। इसके साथ ही नशे की लत, अकादमिक दबाव, पारिवारिक कलह और अनसुलझी मानसिक बीमारियां भी इस जोखिम को कई गुना बढ़ा रही हैं।"
👨💼 पुरुषों में आत्महत्या का आंकड़ा महिलाओं से तीन गुना, 18 से 45 वर्ष का युवा वर्ग सबसे अधिक प्रभावित
देश में आत्महत्या के मामलों में लिंग के आधार पर एक बड़ा अंतर सामने आया है। वर्ष 2023 में कुल आत्महत्या करने वालों में लगभग 72.8 प्रतिशत पुरुष और 27.2 प्रतिशत महिलाएं थीं। यानी पुरुषों की संख्या महिलाओं से लगभग तीन गुना रही।
उम्र के लिहाज से सबसे ज्यादा दबाव उत्पादक और कामकाजी आबादी पर दिख रहा है। 18 से 30 वर्ष और 30 से 45 वर्ष के आयु वर्ग मिलाकर देश की कुल खुदकुशियों का लगभग दो-तिहाई हिस्सा बनाते हैं। यही वह उम्र होती है जब व्यक्ति शिक्षा, करियर, नौकरी, विवाह, परिवार और वित्तीय जिम्मेदारियों के भारी दबाव से गुजर रहा होता है।
🏠 पारिवारिक समस्याएं और गंभीर बीमारियां बनीं सबसे बड़ी वजह
एनसीआरबी 2023 के आंकड़ों के अनुसार, आत्महत्या के पीछे पारिवारिक कलह व समस्याएं सबसे बड़ा कारण बनकर उभरी हैं। कुल मामलों में इनकी हिस्सेदारी लगभग 31.9 प्रतिशत रही। इसके बाद गंभीर और असाध्य बीमारियों से जुड़ी वजहें करीब 19 प्रतिशत पाई गईं। इसके अलावा नशे की लत, वैवाहिक तनाव, आर्थिक तंगी और कर्ज का बोझ प्रमुख कारणों में शामिल हैं। इससे यह साफ है कि आत्महत्या को केवल बेरोजगारी या आर्थिक तंगी से जोड़ना अधूरा विश्लेषण होगा; अक्सर व्यक्ति एक साथ कई तरह के सामाजिक व व्यक्तिगत तनावों से जूझ रहा होता है।
📱 'सोशल मीडिया की आभासी दुनिया ने बढ़ाई अवास्तविक तुलना और हीन भावना'
डॉ. जेपी अग्रवाल के अनुसार, "वर्तमान समय में सफलता के मानक तेजी से बदले हैं। सोशल मीडिया पर लोग अपनी उपलब्धियां, यात्राएं और बेहतरीन जिंदगी के अंश ही साझा करते हैं, लेकिन अपनी असफलताएं या मानसिक परेशानियां कभी जाहिर नहीं करते। इसे देखकर संघर्ष कर रहे व्यक्ति को लगता है कि बाकी सभी की जिंदगी खुशहाल है और केवल वही समस्याओं से घिरा है।" यह अवास्तविक तुलना आगे चलकर हीन भावना, अनुचित प्रतिस्पर्धा, रिश्तों में खटास और अवसाद (Depression) को जन्म देती है।
⚠️ आत्महत्या अचानक नहीं होती, इन चेतावनी भरे संकेतों (Warning Signs) को कभी न करें नजरअंदाज
डॉ. जेपी अग्रवाल ने सबसे महत्वपूर्ण संदेश देते हुए बताया कि आत्महत्या कोई अचानक होने वाली घटना नहीं है; व्यक्ति पहले कई तरह के संकेत देता है:
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बार-बार मरने, जीवन समाप्त करने या आत्महत्या के बारे में बातें करना।
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अचानक अत्यधिक गुमसुम, शांत और अकेला रहने लगना।
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व्यवहार में अप्रत्याशित और बड़ा बदलाव आना या अचानक भारी मात्रा में नशा करना।
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अपनी महत्वपूर्ण व प्रिय वस्तुएं दूसरों को सौंपना और वसीयत या अलविदा जैसी बातें करना।
क्या करें? यदि कोई व्यक्ति ऐसी बातें करता है तो उसकी बात को मजाक या केवल भावनात्मक कमजोरी समझकर खारिज न करें। उसकी बात को धैर्यपूर्वक सुनें, उसे कभी अकेला न छोड़ें, आसपास से नुकसान पहुंचाने वाली वस्तुएं हटा दें और तुरंत किसी पेशेवर मनोचिकित्सक (Psychiatrist) या काउंसलर की मदद लें।
🧠 मानसिक स्वास्थ्य और बीमारी का अंतर समझें, टेली-मानस जैसी हेल्पलाइन का लें सहारा
डॉ. जेपी अग्रवाल के अनुसार, मानसिक स्वास्थ्य, सामान्य मानसिक समस्या और गंभीर मानसिक रोग—ये तीन अलग-अलग चरण हैं। यदि प्राथमिक स्तर पर मानसिक समस्या की पहचान कर उपचार न किया जाए तो वह गंभीर बीमारी में बदल सकती है। भारतीय समाज में आज भी मनोचिकित्सक के पास जाने को लेकर एक हिचकिचाहट और सामाजिक झिझक (Stigma) बनी हुई है। दूरदराज के क्षेत्रों में विशेषज्ञ न होने पर भी भारत सरकार की 'टेली-मानस' (Tele-MANAS) जैसी निशुल्क राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य परामर्श सेवाओं का सहारा लिया जा सकता है। समय पर मिला सही परामर्श ही किसी बहुमूल्य जीवन को बचा सकता है।
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