प्रजनन की स्वतंत्रता पर इंदौर हाई कोर्ट की बड़ी टिप्पणी; महिला को अपने शरीर पर है पूरा अधिकार
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: महिला को गर्भपात के लिए पति की सहमति की अनिवार्यता नहीं। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रजनन स्वतंत्रता का दिया अधिकार।
इंदौर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि गर्भपात (मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी) के लिए पति की सहमति लेना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है। जस्टिस संदीप एन. भट्ट की एकलपीठ ने 13 सप्ताह की गर्भवती महिला को गर्भपात की अनुमति देते हुए कहा कि महिला के अपने शरीर और प्रजनन संबंधी निर्णय लेना उसका मौलिक अधिकार है।
📜 संविधान का अनुच्छेद 21 और व्यक्तिगत स्वायत्तता
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता महिला अपने पति से अलग रह रही है और उसके साथ भविष्य में कोई वैवाहिक संबंध नहीं रखना चाहती। ऐसे में भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 उसे पूर्ण प्रजनन स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वायत्तता का अधिकार प्रदान करता है। कोर्ट ने कहा कि महिला की इच्छा सर्वोपरि है और उसे किसी अन्य की सहमति के अधीन नहीं रखा जा सकता। गौरतलब है कि मामले में पति को नोटिस जारी किया गया था, लेकिन वह सुनवाई के दौरान अदालत में उपस्थित नहीं हुआ।
🛡️ कोर्ट द्वारा निर्णय के 3 मुख्य आधार
अदालत ने इस संवेदनशील मामले में अपना निर्णय सुनाते समय तीन प्रमुख बिंदुओं को प्राथमिकता दी है:
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MTP एक्ट की समय सीमा: महिला की गर्भावस्था वर्तमान में 13 सप्ताह की है। 'मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी' (MTP) एक्ट की धारा 3 के अनुसार, इस निर्धारित समय सीमा के भीतर एक पंजीकृत चिकित्सक की सलाह पर गर्भपात पूरी तरह कानूनी है।
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वैवाहिक अलगाव: पति और पत्नी के बीच चल रहा वैवाहिक अलगाव और आपसी मतभेद भी इस स्थिति में गर्भपात की अनुमति के लिए एक वैध आधार माना गया है।
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मौलिक अधिकारों की सर्वोपरिता: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक महिला की व्यक्तिगत इच्छा और संवैधानिक अधिकार किसी भी अन्य सामाजिक या वैवाहिक बंधन से ऊपर हैं।
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