शहडोल में सोयाबीन की खेती से बढ़ाएं मुनाफा; कृषि वैज्ञानिकों ने दी सही बुवाई और किस्मों की जानकारी
शहडोल में सोयाबीन की खेती के लिए वैज्ञानिक सलाह। चारकोल रॉट से बचाव, सही किस्में और उन्नत बुवाई की तकनीक। किसानों के लिए पूरी गाइड।
शहडोल। शहडोल जिले में सोयाबीन की खेती किसानों की आर्थिक मजबूती का आधार है। जिले के सोहागपुर ब्लॉक के दर्जनों गांवों में किसान दशकों से सोयाबीन की खेती कर रहे हैं। कम लागत और बेहतर मुनाफे के कारण इसे 'पीला सोना' (कैश क्रॉप) कहा जाता है। वर्तमान में बारिश का अनुकूल दौर शुरू हो चुका है, जो सोयाबीन की बुवाई के लिए उचित समय है। हालांकि, कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि किसानों को चारकोल रॉट जैसी बीमारियों से बचने के लिए उन्नत किस्मों और सही बुवाई तकनीक का चयन करना आवश्यक है।
🌱 वैज्ञानिक तरीका: बुवाई और मिट्टी का चयन
कृषि वैज्ञानिक डॉ. बी.के. प्रजापति के अनुसार, सोयाबीन के लिए दोमट या काली भारी मिट्टी सबसे उपयुक्त है, जिसमें जल निकासी की उचित व्यवस्था हो।
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मिट्टी की तैयारी: बारिश के बाद खेत की 2-3 बार कल्टीवेटर से जुताई कर मिट्टी को भुरभुरा कर लें।
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बुवाई का समय: 15 जून से 15 जुलाई का समय इसके लिए सर्वोत्तम है। यदि बारिश अधिक हो रही है, तो खेत में जल भराव से बचें।
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बीज दर: छोटे दानों वाली किस्म के लिए 70-75 किग्रा प्रति हेक्टेयर और बड़े दानों वाली किस्म के लिए 80-85 किग्रा प्रति हेक्टेयर बीज की मात्रा पर्याप्त है। बुवाई से पहले बीजोपचार अवश्य करें।
🛡️ रोग प्रतिरोधी किस्में और आधुनिक मशीनरी
शहडोल में लगभग 10,000 हेक्टेयर भूमि पर सोयाबीन की खेती होती है। चारकोल रॉट जैसी बीमारियों से बचाव के लिए वैज्ञानिक 'जवाहर सोयाबीन' की 2029, 2034, 2069, 2116 और 'एनआरसी 150' किस्मों को अपनाने की सलाह देते हैं।
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आधुनिक तकनीक: किसानों को 'रिज बेड प्लांटर' या 'ब्रॉड बेड फेरो' मशीन से बुवाई करने की सलाह दी गई है। इससे अत्यधिक बारिश होने पर नालियों के माध्यम से पानी की निकासी हो जाती है, जिससे फसल सड़ने से बच जाती है, और कम बारिश की स्थिति में खेत में नमी बनी रहती है।
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