घनघोर जंगल में कैद दो गांव; बाघ और भालू के साये में जीने को मजबूर ग्रामीण, विस्थापन की उठाई मांग

पन्ना टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में बसे मनकी और जरधोवा गांव के ग्रामीण खूंखार वन्यजीवों के डर के बीच रह रहे हैं। गांव वालों ने सरकार से विस्थापन की मांग की है।

Jul 09, 2026 - 14:42
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घनघोर जंगल में कैद दो गांव; बाघ और भालू के साये में जीने को मजबूर ग्रामीण, विस्थापन की उठाई मांग

पन्ना। पन्ना टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में स्थित ग्राम पंचायत मनकी और ग्राम पंचायत जरधोवा के निवासी अपनी जान जोखिम में डालकर जीवन जीने को मजबूर हैं। चारों तरफ घनघोर जंगल से घिरे इन गांवों में टाइगर, तेंदुए और भालुओं का हर समय डेरा रहता है। ग्रामीणों का कहना है कि वे अब वन्यजीवों के डर के साये में और नहीं रह सकते, इसलिए सरकार को उन्हें व्यवस्थित पैकेज देकर जल्द से जल्द दूसरी जगह विस्थापित करना चाहिए।

🚧 10 किलोमीटर का खौफनाक सफर

इन गांवों में अधिकांश आदिवासी और यादव समाज के लोग निवास करते हैं। दूध के व्यवसाय और अन्य जरूरतों के लिए उन्हें प्रतिदिन 10 किलोमीटर का घनघोर जंगल पार करना पड़ता है। शाम ढलते ही रास्तों पर जंगली जानवरों की दहाड़ सुनाई देने लगती है। स्थानीय निवासी राकेश कुमार यादव के अनुसार, रात में सफर करना बेहद खतरनाक होता है। ग्रामीणों को सुरक्षा के लिए झुंड बनाकर चलना पड़ता है, और कई बार जानवरों के आमने-सामने आने पर उन्हें घंटों रास्ता साफ होने का इंतजार करना पड़ता है।

⚠️ बाघ का शिकार बन चुका है मासूम

वन्यजीवों का खतरा कोई काल्पनिक नहीं, बल्कि एक कड़वा सच है। करीब दो महीने पहले जरधोवा गांव में बाघ ने खेत में जा रहे एक बालक को अपना निवाला बना लिया था। इस दुखद घटना के बाद से ग्रामीण और अधिक दहशत में हैं। मुआवजे के तौर पर प्रशासन ने पीड़ित परिवार को 8 लाख रुपये की सहायता दी थी, लेकिन ग्रामीणों का मानना है कि मुआवजे से ज्यादा जरूरी उनका जीवन सुरक्षित करना है, जिसका एकमात्र स्थाई हल 'विस्थापन' ही है।

🗣️ प्रशासन का रुख: बातचीत के लिए खुले हैं रास्ते

पन्ना टाइगर रिजर्व की डिप्टी डायरेक्टर बीके पटेल ने इस स्थिति पर संज्ञान लिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मनकी और जरधोवा दोनों गांव टाइगर रिजर्व के संवेदनशील क्षेत्र में आते हैं। प्रशासन का मानना है कि इन गांवों की समस्याओं का एकमात्र स्थाई समाधान विस्थापन ही है। विभाग ने ग्रामीणों को आश्वस्त किया है कि यदि वे विस्थापन के लिए तैयार होते हैं, तो उचित पैकेज और पुनर्वास के लिए सभी रास्ते खुले हुए हैं। अब गेंद ग्रामीणों और सरकार के बीच होने वाली वार्ता पर टिकी है।

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