युवती की मां का बयान बना आधार; हाई कोर्ट ने युवक को दोषमुक्त करते हुए उम्रकैद की सजा निरस्त की
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने पाक्सो एक्ट के एक मामले में युवक की उम्रकैद की सजा निरस्त की। कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष पीड़िता के नाबालिग होने को साबित करने में नाकाम रहा।
जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान पाक्सो एक्ट (POCSO Act) के तहत आजीवन कारावास की सजा काट रहे युवक को बड़ी राहत दी है। हाई कोर्ट की युगलपीठ ने पाया कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि घटना के समय पीड़िता नाबालिग थी। इस आधार पर कोर्ट ने जिला न्यायालय द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा को निरस्त कर दिया है।
📜 अपील का आधार: सहमति से रिश्ते और वयस्कता
डिंडौरी निवासी मुकेश पेंड्रा ने जिला न्यायालय के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। याचिका में तर्क दिया गया कि पीड़िता वयस्क है और उसने स्वेच्छा से आरोपी के साथ संबंध बनाए थे। युवती ने अपने बयानों में भी यह स्पष्ट किया है कि वह आरोपी के खिलाफ किसी भी तरह की कानूनी कार्रवाई नहीं चाहती है, क्योंकि उनके संबंध आपसी सहमति पर आधारित थे।
📅 जन्म प्रमाण पत्र और मां का बयान बना निर्णायक
केस में पीड़िता की जन्मतिथि और आयु को लेकर विवाद था। अभियोजन पक्ष ने 10वीं की अंकसूची और 2018 में बने जन्म प्रमाण पत्र को आधार बनाया, जबकि याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि ये दस्तावेज विश्वसनीय नहीं हैं। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस एके सिंह की युगलपीठ ने कहा कि जन्म के 11 साल बाद बनवाया गया जन्म प्रमाण पत्र कानूनी रूप से मान्य साक्ष्य के रूप में कमजोर है।
👩👧 मां का बयान बना सबसे बड़ा सबूत
कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि पीड़िता की मां का बयान सभी दस्तावेजों से अधिक महत्वपूर्ण है। मां ने न्यायालय को बताया कि उसने बेटी को 7-8 साल की उम्र में पहली कक्षा में दाखिला दिलाया था और वह 12वीं की परीक्षा के दौरान दो बार फेल भी हुई थी। कोर्ट ने माना कि मां के बयान के आधार पर पीड़िता का जन्म 2005 में हुआ था। इस गणना के अनुसार, फरवरी 2024 (घटना के समय) पीड़िता की आयु 18 वर्ष से अधिक थी, जिसके कारण पाक्सो एक्ट का मामला सिद्ध नहीं होता।
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