केले के रेशों से बनी बोतलें अब बन रही हैं पहचान; बुरहानपुर की महिलाओं ने कचरे को बनाया कमाई का जरिया

बुरहानपुर की महिलाओं ने केले के कचरे से बनाई ईको-फ्रेंडली बोतलें। अब तक 200 से अधिक बोतलों की सप्लाई। पर्यावरण संरक्षण के साथ हो रही है बंपर कमाई।

Jul 12, 2026 - 18:13
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केले के रेशों से बनी बोतलें अब बन रही हैं पहचान; बुरहानपुर की महिलाओं ने कचरे को बनाया कमाई का जरिया

बुरहानपुर। मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले के एकझिरा गांव में लवकुश स्व-सहायता समूह की महिलाओं ने एक अनूठी मिसाल पेश की है। केले की फसल काटने के बाद जो तने बेकार समझकर फेंक दिए जाते थे, अब उन तनों से ये महिलाएं रेशे निकालकर बेहतरीन ईको-फ्रेंडली उत्पाद बना रही हैं। उनकी बनाई गई 'केले के रेशों वाली बोतलें' अब न केवल देश के विभिन्न राज्यों में, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पसंद की जा रही हैं।

💧 अनोखी तकनीक: पानी रहता है ठंडा, नहीं होता लीकेज

इन बोतलों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन्हें केले के रेशों से पूरी तरह कवर किया गया है। यह तकनीक पानी को लंबे समय तक ठंडा बनाए रखती है और इसमें पानी लीकेज की समस्या भी नहीं होती। समूह ने 500 मिलीलीटर से लेकर 1.5 लीटर तक की तीन अलग-अलग साइज की बोतलें तैयार की हैं। मात्र 250 से 300 रुपये की लागत से बनने वाली ये बोतलें बाजार में 550 से 1250 रुपये तक बिक रही हैं, जिससे समूह की महिलाओं को अच्छा मुनाफा हो रहा है।

👩‍💼 12 महिलाओं की मेहनत और प्रशिक्षण का परिणाम

समूह की अध्यक्ष अनुसुइया चौहान ने बताया कि मध्य प्रदेश राज्य आजीविका मिशन के सहयोग से विशेष प्रशिक्षण लेने के बाद 12 महिलाओं ने मिलकर यह काम शुरू किया। उन्होंने बताया कि मशीन से केले के तनों से रेशे निकाले जाते हैं और उन्हें सुखाकर आकर्षक डिजाइन तैयार किए जाते हैं। इससे पहले ये महिलाएं इसी रेशे से टोपी भी बना चुकी हैं, जिसे लंदन तक सराहा गया था। अब उनकी बनी बोतलों की ऑनलाइन और ऑफलाइन डिमांड तेजी से बढ़ रही है।

🌍 पर्यावरण संरक्षण की नई मिसाल

बुरहानपुर में 26,120 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में केले की खेती होती है, जिससे भारी मात्रा में कचरा निकलता है। इन महिलाओं ने इस 'वेस्ट' को 'बेस्ट' में बदलकर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी बड़ा कदम उठाया है। स्थानीय प्रशासन ने भी इस पहल की सराहना करते हुए सरकारी दफ्तरों में इन बोतलों को प्राथमिकता दी है। यह प्रयास न केवल ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बना रहा है, बल्कि प्लास्टिक मुक्त भविष्य के लिए भी एक प्रेरक उदाहरण है।

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