आज भी 'गुलामी' सा जीवन जीने को मजबूर लामा-टुटैला के लोग; नदियों और पहाड़ों के बीच कैद है पूरा गांव
सतना के लामा-टुटैला गांव की दर्दनाक जमीनी हकीकत। बुनियादी सुविधाओं से वंचित ग्रामीण बरसात में हो जाते हैं नजरबंद। जनप्रतिनिधियों के खोखले वादों की खुली पोल।
सतना । "हम भी आजाद भारत के निवासी हैं साहब! हमें भी हमारे बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा, रोजगार और व्यवसाय के साथ-साथ सड़क, नाली, पक्का घर और शौचालय चाहिए।" यह मर्मस्पर्शी दर्द जिला मुख्यालय से करीब 80 किलोमीटर दूर, दुर्गम पहाड़ों और नदियों के बीच बसे लामा-टुटैला गांव के 67 वर्षीय बुजुर्ग शिवप्रसाद सिंगरौल का है। देश जहां अपनी आजादी का 79वां वर्ष मनाने जा रहा है, वहीं सतना जिले के मझगवां विकासखंड की कौल्हारी ग्राम पंचायत का यह इलाका आज भी विकास की मुख्यधारा से कोसों दूर अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है।
🎒 शिक्षा की राह में रोड़ा बनी उफनती नदियां, बेटियां घर में कैद
गांव की किशोरी शांति बताती हैं कि उन्होंने हाल ही में आठवीं कक्षा उत्तीर्ण कर नौवीं में प्रवेश लिया है। लेकिन स्कूल खुलने के शुरुआती चार महीनों तक वह स्कूल नहीं जा सकेंगी। इसका कारण यह है कि मानसून के दौरान गांव को घेरने वाली नदियां उफान पर रहती हैं, जिससे रास्ता पूरी तरह बंद हो जाता है। पढ़ाई की इस बेबसी के कारण गांव की कई बेटियों का भविष्य अंधकारमय बना हुआ है।
🌊 बरसात में टापू बन जाता है गांव, जान जोखिम में डालकर ट्यूब का सहारा
बुजुर्ग शिवप्रसाद के अनुसार, लामा-टुटैला गांव के लिए आज तक कोई पक्की सड़क या पुल नहीं बनाया जा सका है। बारिश के मौसम में यह क्षेत्र दोनों तरफ से उफनती नदियों से घिर जाता है। जब तक जलस्तर नीचे नहीं उतरता, तब तक ग्रामीण गांव में ही पूरी तरह कैद रहते हैं। किसी गंभीर आपात स्थिति या बीमारी के दौरान लोगों को ट्यूब के सहारे नदी पार कराई जाती है, जिसमें कई बार लोग बह भी चुके हैं।
🗺️ तीन सीमाओं पर बसा उपेक्षित गांव, सरकारी योजनाएं शून्य
भौगोलिक रूप से यह गांव सतना (एमपी), पन्ना और उत्तर प्रदेश के बांदा जिले की सीमाओं पर स्थित है। सीमावर्ती क्षेत्र होने के कारण दोनों राज्यों की सरकारें इस ओर ध्यान नहीं दे रही हैं। साठ-सत्तर घरों की इस बस्ती में आज तक न तो शौचालय बन पाए हैं और न ही केंद्र या राज्य सरकार की किसी अन्य कल्याणकारी योजना का लाभ यहां तक पहुंचा है। सुविधाओं के अभाव से तंग आकर तीन पीढ़ियों से इस दंश को झेल रहे कई परिवार अब पलायन कर चुके हैं।
🗳️ जनप्रतिनिधियों की बेरुखी: केवल चुनाव में याद आते हैं वादे
गांव की माया (69) और रामबाबू बताते हैं कि आज तक कोई भी सक्रिय जनप्रतिनिधि गांव के भीतर नहीं पहुंचा है। नेता मुख्य सड़क तक आते हैं, नदी पार पुल बनवाने का चुनावी वादा करते हैं और लौट जाते हैं। ग्रामीणों के अनुसार, केवल चित्रकूट विधानसभा से कांग्रेस के दिवंगत विधायक प्रेम सिंह ही एकमात्र ऐसे नेता थे, जिन्होंने नदी पार कर गांव का दौरा करने की हिम्मत दिखाई थी, लेकिन उनके जाने के बाद दोबारा किसी ने सुध नहीं ली।
📅 मजबूरी की अनूठी रस्म: केवल गर्मियों में होते हैं विवाह संस्कार
यातायात और कनेक्टिविटी की इस गंभीर समस्या के कारण लामा-टुटैला गांव में अब एक अनोखी रस्म बन गई है। यहां सभी मांगलिक कार्य और शादी-ब्याह सिर्फ गर्मियों के दिनों में आयोजित किए जाते हैं। बारिश या ठंड के मौसम में उफनती नदियों और खराब रास्तों की वजह से कोई भी बारात या रिश्तेदार गांव तक नहीं पहुंच पाता है, जिसके चलते ग्रामीणों को यह फैसला लेना पड़ा है।
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