मंत्री लखन पटेल से क्यों छीना पशुपालन विभाग? अमित शाह तक शिकायत पहुंचने के बाद दिल्ली से हुआ फैसला
मप्र के मंत्री लखन पटेल से पशुपालन विभाग छीनकर आनंद विभाग सौंपे जाने की बड़ी वजहें सामने आई हैं। एनडीडीबी प्रोजेक्ट में देरी को लेकर अमित शाह तक शिकायत पहुंची थी।
भोपाल। मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार में कैबिनेट मंत्री लखन पटेल से महत्वपूर्ण पशुपालन विभाग वापस लिए जाने की बड़ी और चौंकाने वाली वजहें लगातार सामने आ रही हैं। मंत्री लखन पटेल से इतना महत्वपूर्ण विभाग छीनकर उन्हें राज्य का सबसे छोटा 'आनंद विभाग' सौंपे जाने पर राजनीतिक गलियारों में कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। गौरतलब है कि लखन पटेल के पास अब जो एकमात्र आनंद विभाग बचा है, उसका सालाना बजट बमुश्किल ₹12 करोड़ ही है, जिसे आमतौर पर वरिष्ठ मंत्रियों के पास अतिरिक्त प्रभार के रूप में रखा जाता था। इस बीच, राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि पशुपालन विभाग छीने जाने के पीछे गौशालाओं के लिए आवंटित होने वाली सरकारी जमीन से जुड़ी एक गंभीर शिकायत थी। बताया जा रहा है कि गौशालाओं के लिए 125 एकड़ जमीन के आवंटन के लिए 'लेटर ऑफ इंटेंट' (LOI) जारी करने के मामले में कथित वित्तीय सौदेबाजी की शिकायत सीधे केंद्रीय गृह और सहकारिता मंत्री अमित शाह तक पहुंची थी, जिसके बाद यह बड़ी कार्रवाई की गई।
🥛 NDDB प्रोजेक्ट में लापरवाही और दिल्ली का फरमान: राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के काम में देरी के बाद रातों-रात हुआ बदलाव
दरअसल, मध्य प्रदेश में सहकारी दुग्ध संघ को मजबूत करने की दिशा में केंद्रीय सहकारिता मंत्री अमित शाह की सीधी निगरानी में एक बड़ा काम चल रहा था। अप्रैल 2025 में केंद्रीय मंत्री अमित शाह की गरिमामयी उपस्थिति में भोपाल में मध्य प्रदेश सरकार और राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) के बीच एक ऐतिहासिक सहकारिता अनुबंध हुआ था। इस दीर्घकालिक साझेदारी के तहत मध्य प्रदेश में आगामी 5 वर्षों में 3,000 नई दुग्ध समितियां स्थापित करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा गया था। अनुबंध के अनुसार, प्रदेश की छह दुग्ध संघों के प्रबंधन को एनडीडीबी (NDDB) को सौंपने में विभागीय स्तर पर अनावश्यक रूप से अत्यधिक देरी की गई। इसकी शिकायतें केंद्रीय सहकारिता विभाग की उच्च स्तरीय बैठक के दौरान सीधे अमित शाह तक पहुंच गईं।
इसके बाद, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और मुख्य सचिव अनुराग जैन द्वारा की गई समीक्षा बैठकों में भी इस प्रोजेक्ट की धीमी प्रगति को लेकर कड़ी नाराजगी जताई गई थी, लेकिन इसके बावजूद जमीनी स्तर पर कार्यों में अपेक्षित तेजी दिखाई नहीं दी। इसके अलावा, सड़कों पर घूम रहे बेसहारा गौवंश के लिए बड़ी स्वावलंबी गौशालाएं खोलने के निर्णय के तहत 125 एकड़ भूमि के आवंटन की प्रक्रिया में भी पात्रता नियमों की अनदेखी करने और अपात्र संस्थाओं को लाभ पहुंचाने की शिकायतें दिल्ली पहुंचीं। यह घटनाक्रम इतनी तेजी से हुआ कि पहली बार मंत्री बने लखन पटेल को इसकी भनक तक नहीं लग सकी। मंगलवार की रात सीधे दिल्ली से मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को निर्देश प्राप्त हुए, जिसके बाद रात में ही मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) द्वारा मुख्य सचिव को तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए गए। आनन-फानन में नोटिफिकेशन तैयार किया गया और राज्यपाल की मंजूरी मिलते ही विभाग वापस ले लिया गया।
✉️ जीतू पटवारी ने साधा सरकार पर निशाना: सीएम को लिखे पत्र में पूछा— क्या विभाग बदलने से बेसहारा गोवंश की बदहाली भी बदलेगी?
दूसरी ओर, मंत्री लखन पटेल से पशुपालन विभाग वापस लेकर उसे मुख्यमंत्री द्वारा अपने पास रखे जाने पर विपक्षी दल कांग्रेस ने सरकार को आड़े हाथों लिया है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को एक कड़ा पत्र लिखकर सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। जीतू पटवारी ने अपने पत्र में लिखा:
"यह जानकर आश्चर्य हुआ कि मुख्यमंत्री ने गौ-पालन एवं पशुपालन विभाग अब अपने पास रखने का निर्णय लिया है। लोकतंत्र में कैबिनेट मंत्रियों के विभाग बदलना पूरी तरह मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार है, लेकिन प्रदेश की जनता यह भी जानना चाहती है कि क्या सिर्फ विभाग का चेहरा बदलने से जमीनी व्यवस्था भी बदलेगी? मुख्यमंत्री के पास पहले से ही गृह सहित अनेक महत्वपूर्ण और भारी-भरकम विभाग हैं। दुर्भाग्य यह है कि जिन विभागों की जिम्मेदारी सीधे मुख्यमंत्री के पास है, वे भी जनता की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर पा रहे हैं। अब जब पशुपालन विभाग भी आपने अपने हाथ में ले लिया है, तो प्रदेश के किसान, पशुपालक और गौ-भक्त यह पूछने को विवश हैं कि क्या इस विभाग का भविष्य भी बाकी उपेक्षित विभागों जैसा ही होगा?"
जीतू पटवारी ने पत्र में प्रशासनिक विफलता का आरोप लगाते हुए आगे लिखा कि भाजपा ने वर्षों से गाय को अपनी राजनीति का सबसे बड़ा प्रतीक बनाया है, लेकिन इसके बाद भी मध्य प्रदेश का गोवंश सबसे अधिक उपेक्षित है। सरकार ने खुद विधानसभा में स्वीकार किया है कि पिछले दो वर्षों में बेसहारा गोवंश के कारण सड़कों पर 237 हादसे हुए, जिनमें 94 बेकसूर लोगों की मौत हुई और 133 लोग गंभीर रूप से घायल हुए। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि एक गौशाला में एक गोवंश के पालन पर प्रतिदिन लगभग ₹70 का वास्तविक खर्च आता है, जबकि सरकार द्वारा दिया जाने वाला अनुदान इससे काफी कम है। यदि मुख्यमंत्री ने यह विभाग केवल फाइलों में संख्या बढ़ाने के लिए अपने पास रखा है, तो इससे प्रदेश के गोवंश का कोई भला नहीं होने वाला।
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